भारत के विकास की चर्चा प्रायः आर्थिक वृद्धि, आधारभूत संरचना और तकनीकी प्रगति तक सीमित रहती है. लेकिन अगर भारत को वास्तव में ‘विकसित भारत’ बनाना है, तो हमें अपनी उस सभ्यतागत व्यवस्था को भी समझना होगा जिसने हज़ारों वर्षों तक समाज को आत्मनिर्भर बनाए रखा. भारत अपने जन्म से ही एक हिंदू देश रहा है. यहां की हर व्यवस्था धर्म के नियमों, आदर्शों और मूल्यों पर टिकी है. इन आदर्शों को संजोए रखने और आगे बढ़ाने वाली व्यवस्था थी मंदिर, गुरुकुल और समाज का त्रिवेणी संबंध. प्राचीन भारत में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं थे; वे शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, जल प्रबंधन, कला, संस्कृति, रोज़गार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख संस्थान थे. गुरुकुल ज्ञान और मानव पूंजी के निर्माण का माध्यम थे, जबकि समाज इन दोनों संस्थाओं का संरक्षक और पोषक था. यह एक विकेंद्रीकृत, समाज-आधारित विकास मॉडल था.
एनएसएसओ का 2020 का आंकड़ों के अनुसार भारत की लगभग 80% (110) हिंदू आबादी के लिए केवल 5 लाख मंदिर हैं, जबकि लगभग 19% मुस्लिम आबादी (30 करोड़) के लिए 7 लाख मस्जिदें, 1.5% ईसाई आबादी के लिए लगभग 75 हज़ार चर्च है. वहीं मदरसों की संख्या 3.5 लाख, गुरुकुल केवल 3,500 और चर्च से संबद्ध शिक्षा संस्थाओं की संख्या लगभग 50,000 है. यह आंकड़ें भारत में धार्मिक संस्थाओं की भूमिका और उनके प्रशासन को लेकर चल रही बहस को प्रतिबिंबित करते हैं.
हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं ‘धर्मो रक्षित रक्षित’ लेकिन हम इस बात को भूल गए. इसलिए हमारे मंदिर और गुरूकुल घटते चले गए. भारत में रहने वाले मुसलमान अपने मज़हब पर अडिग रहे, और वे आज एक हिंदू देश में मंदिरों से भी अधिक मस्जिद और मदरसे बनाए बैठे हैं. हलाल इकॉनमी आज आसमान छू रही है, जिससे जिहाद और आतंकवाद फल-फूल रहा है, जिससे भारत को आंतरिक और बाहरी रूप से तौड़ने और खोख़ला करने की साजिशों को अंजाम दिया जा रहा है. लेकिन सवाल यह है कि भारत में हिंदुओं के बहुसंख्यक होते हुए और मुसलमान के सिर्फ 19% होने पर मंदिर और मस्जिद के बीच आंकड़ों का इतना बड़ा फासला कैसे है?, भारत के मंदिर, गुरुकुल की व्यवस्था को सिर्फ कर्मकांड तक सीमित करके क्यों रख दिया गया है और अतीत में भारत के विकसित बने रहने में मदिरों की क्या भूमिका थी.
इसका जवाब आपको भारत के संविधान में मिलेगा. भारतीय संविधान में अनुच्छेद 30 वह प्रमुख प्रावधान है, जो धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उन्हें अपने तरीके से प्रशासित करने का विशेष अधिकार देता है. अनुच्छेद 30 (1) के तहत हिंदुओं को एक बहुसंख्यक समुदाय माना जाता है. इसलिए, उन्हें सीधे तौर पर इस विशिष्ट अधिकार (अनुच्छेद 30) का लाभ नहीं मिलता है. वहीं अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यक वर्गों के हितों को संरक्षित करता है, जिसमें 29 (1) भारत के नागरिकों को उनकी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार देता है. इस संवैधानिक व्यवस्था ने भारत में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
भारत में हिंदू मंदिरों का प्रशासन अन्य धार्मिक संस्थाओं से भिन्न व्यवस्था के अंतर्गत है. देश में स्थित 5 लाख मदिरों में से अधिकांशतः लगभग 4 लाख मंदिरों का नियंत्रण परोक्ष और अपरोक्ष रूप से सरकार के हाथों में है. जबकि मस्जिद और चर्च सरकारी नियंत्रण से मुक्त हैं. भारत में हिंदू मंदिरों के प्रबंधन को लेकर एक विशिष्ट प्रशासनिक व्यवस्था देखने को मिलती है. अनेक राज्यों में बड़ी संख्या में हिंदू मंदिर विभिन्न राज्य सरकारों के अधीन बने हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभागों, देवस्थान बोर्डों या वैधानिक ट्रस्टों द्वारा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संचालित किए जाते हैं. इसके उलट मस्जिदों का प्रबंधन मुख्यतः वक्फ अधिनियम के अंतर्गत गठित वक्फ बोर्डों और स्थानीय मुतवल्लियों द्वारा, जबकि चर्चों का संचालन संबंधित चर्च ट्रस्टों, डायोसीज़ और धार्मिक संस्थाओं द्वारा किया जाता है. इन भिन्न प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की भूमिका पर लंबे समय से सार्वजनिक और न्यायिक बहस चल रही है.
इसका प्रभाव केवल प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि विशाल धार्मिक संपत्तियों और उनके संसाधनों के उपयोग से भी जुड़ा हुआ है. उदाहरण के लिए केरल में त्रावणकोर और गुरुवायूर देवस्वम बोर्ड 3,000 मंदिरों को संचालित करता है, अकेले सबरीमाला मंदिर त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड को सालाना ₹600 करोड़ तक का राजस्व देता है. जबकि तमिलनाडु में हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग 44,000 से अधिक मंदिरों का संचालन करता है, जिसमे श्रीरंगम मंदिर अपनी अचल संपत्तियों, दान से प्राप्त आय से प्रतिवर्ष ₹50 करोड़ से अधिक का राजस्व अर्जित करता है. आंध्र प्रदेश में तिरुपति मंदिर का वार्षिक बजट ₹5,200 करोड़ से अधिक का होता है, जबकि कर्नाटक में मुजराई (धर्मार्थ) विभाग के अंतर्गत 30,000 से अधिक मंदिर राज्य के नियंत्रण में आते हैं. विभिन्न राज्यों में मंदिरों की कुल आय कई बार 10,000 करोड़ रुपए से अधिक तक पहुंच जाती है. इससे पता चलता है कि अनेक राज्यों में मंदिरों की विशाल संपत्तियों और आय पर प्रशासन सीधे तौर पर नज़र रखता है.
जहां एक ओर अनेक राज्यों में हिंदू मंदिरों के प्रशासन का वर्तमान ढांचा औपनिवेशिक काल की उस व्यवस्था से विकसित हुआ है, जिसकी शुरुआत ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश शासन द्वारा धार्मिक बंदोबस्तों के नियमन से हुई थी. मदिरों को अधिगृहीत कर सरकार द्वारा चलाए जाने के लिए बना कानून ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश इंडिया गवर्नमेंट द्वारा बनाए गए ‘मद्रास हिंदू टेंपल एक्ट’ पर आधारित है. इस एक्ट को स्वतंत्रता के बाद बिना संसदीय अनुमोदन के ‘हिंदू रीलिजियस प्लेस एंड टेंपल एमेंडमेंट, एक्ट, 1951’ का रूप दे दिया गया.
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 26 प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक संस्थानों की स्थापना, प्रबंधन तथा धार्मिक मामलों के संचालन का अधिकार देता है. साथ ही, अनुच्छेद 25(2)(a) राज्य को यह अधिकार भी देता है कि वह धार्मिक संस्थाओं से संबंधित लौकिक गतिविधियों का विनियमन या नियंत्रण सार्वजनिक हित में कर सके. इसी प्रावधान के आधार पर विभिन्न राज्यों ने हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती संबंधी कानून बनाए, जिनके अंतर्गत अनेक हिंदू मंदिरों का प्रशासन सरकारी विभागों, देवस्थान बोर्डों या वैधानिक ट्रस्टों द्वारा संचालित किया जाता है. दूसरी ओर, मस्जिदों का प्रबंधन मुख्यतः वक्फ बोर्डों के माध्यम से, जबकि चर्चों का संचालन संबंधित चर्च ट्रस्टों, डायोसीज़ और धार्मिक निकायों द्वारा किया जाता है. क्यों की भारतीय सविधान की भाषा में इस संस्थानों में धर्मनिरपेक्ष की ज़रुरत नहीं है. यही कारण है इन अलग- अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के कारण यह प्रश्न लंबे समय से सार्वजनिक विमर्श का विषय बना हुआ है कि क्या सभी धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन और राज्य की भूमिका के लिए समान संवैधानिक मानदंड है? अनेक विधि विशेषज्ञों का मत है कि धार्मिक स्वतंत्रता, संस्थागत स्वायत्तता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए इस विषय पर व्यापक संवैधानिक और नीतिगत समीक्षा की आवश्यकता है.
यदि हम भारतीय सभ्यता देखें तो स्पष्ट होता है कि मंदिर भारतीय समाज के सबसे बड़े सार्वजनिक संस्थानों में थे. सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहां समाज का विकास केवल राज्य के भरोसे नहीं हुआ. परिवार, समुदाय, ग्रामसभा, मंदिर, गुरुकुल, श्रेणियां और व्यापारिक संघ इन सभी संस्थाओं ने मिलकर एक ऐसा सामाजिक-आर्थिक तंत्र विकसित किया जिसने हजारों वर्षों तक भारतीय समाज को आत्मनिर्भर बनाए रखा. यह व्यवस्था ‘विकेंद्रीकृत शासन’ और ‘सामुदायिक उत्तरदायित्व’ के सिद्धांत पर आधारित थी. अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता एलिनोर ओस्ट्रोम ने भी सामुदायिक संस्थाओं द्वारा संसाधनों के सफल प्रबंधन को आधुनिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना है. भारतीय सभ्यता ने इस मॉडल का प्रयोग सहस्राब्दियों पहले ही कर लिया था.
आज मंदिरों को प्रायः केवल धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में देखा जाता है, जबकि ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि प्राचीन भारत में मंदिर बहुआयामी सार्वजनिक संस्थान थे. वे शिक्षा, स्वास्थ्य, कला, कृषि, जल-संरक्षण, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार, वित्तीय प्रबंधन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख केंद्र थे. इतिहासकार बर्टन स्टीन ने मंदिरों को ऐसे संस्थान कहा है जो स्थानीय प्रशासन और आर्थिक गतिविधियों का संचालन करते थे, जबकि नोबोरु कराशिमा और आर. चंपाकलक्ष्मी ने दक्षिण भारतीय मंदिरों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शहरीकरण का प्रमुख चालक बताया है.
छठी से तेरहवीं शताब्दी के बीच चोल, पल्लव, पांड्य और होयसला राजवंशों ने हजारों मंदिरों का निर्माण कराया. केवल तमिलनाडु से ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा एपिग्राफिया इंडिका में प्रकाशित 30,000 से अधिक शिलालेख प्राप्त हुए हैं, जिनमें अधिकांश मंदिरों की दीवारों पर अंकित हैं. इन अभिलेखों में भूमि दान, कर व्यवस्था, सिंचाई, विद्यालयों, चिकित्सालयों, अन्नदान, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा स्थानीय प्रशासन का विस्तृत विवरण मिलता है. यह विश्व के सबसे बड़े अभिलेखीय संग्रहों में से एक है.
इतिहासकारों के अनुसार चोल काल (9वीं–13वीं शताब्दी) में मंदिरों को हज़ारों एकड़ कृषि भूमि दानस्वरूप प्राप्त थी. इन भूमियों से होने वाली आय का उपयोग केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए नहीं, बल्कि विद्यालयों, छात्रावासों, पुस्तकालयों, अन्नक्षेत्रों, चिकित्सालयों, सिंचाई परियोजनाओं और सार्वजनिक निर्माण कार्यों के लिए किया जाता था. प्रसिद्ध बृहदीश्वर मंदिर के शिलालेखों में सैकड़ों कर्मचारियों, कलाकारों, नर्तकों, संगीतज्ञों और प्रशासकीय अधिकारियों का उल्लेख मिलता है. इससे स्पष्ट होता है कि मंदिर एक संगठित आर्थिक संस्था के रूप में कार्य करते थे.
प्राचीन गुरुकुल केवल धार्मिक शिक्षा के केंद्र नहीं थे. वहां वेद, व्याकरण, गणित, आयुर्वेद, ज्योतिष, दर्शन, तर्कशास्त्र, राज्यशास्त्र, कृषि, वास्तुकला, धातुकर्म और शिल्प की शिक्षा दी जाती थी. शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़गार नहीं, बल्कि चरित्र, नेतृत्व और सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्माण था. गुरुकुलों का संचालन समाज और मंदिरों के सहयोग से होता था. विद्यार्थियों के भोजन, आवास, वस्त्र, पुस्तकें और शिक्षकों के निर्वाह की व्यवस्था दान और सामुदायिक सहयोग से होती थी. शिक्षा को सेवा माना जाता था, व्यापार नहीं.
दक्षिण भारत के एन्नायिरम वैदिक कॉलेज – प्राचीन चोल साम्राज्य के दौरान स्थापित एक ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान के 11वीं शताब्दी के शिलालेखों से ज्ञात होता है कि वहां लगभग 340 विद्यार्थी और एक दर्जन से अधिक आचार्य अध्ययन-अध्यापन में संलग्न थे, जिनके भोजन, आवास और मानदेय की व्यवस्था मंदिर की आय से होती थी. इसी प्रकार सलोटगी मंदिर कॉलेज जोकि 10वीं शताब्दी के त्रैपुरुष मंदिर से चलाया जाता है और श्रृंगेरी शारदा पीठ जैसे संस्थान मंदिर-समर्थित शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं.
इतिहासकार बर्टन स्टीन, नोबोरु कराशिमा और आर. चंपाकलक्ष्मी ने अपने शोध में बताया है कि दक्षिण भारत के बड़े मंदिर स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र थे. मंदिरों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों में पुरोहित, शिक्षक, विद्यार्थी, मूर्तिकार, स्थापत्य विशेषज्ञ, बुनकर, स्वर्णकार, धातु शिल्पी, बढ़ई, चित्रकार, नर्तक, संगीतज्ञ, किसान, जल प्रबंधक, रसोइये, लेखाकार, सुरक्षा कर्मी, व्यापारी और परिवहन सेवाओं से जुड़े लोग शामिल थे. एक बड़े मंदिर के आसपास संपूर्ण स्थानीय आर्थिक तंत्र विकसित हो जाता था. कई मंदिर स्थानीय स्तर पर ऋण प्रदान करते थे, अनाज का भंडारण करते थे और व्यापारिक लेन-देन के सुरक्षित केंद्र के रूप में कार्य करते थे,.इसी कारण अनेक इतिहासकार उन्हें ‘टेम्पल बैंकिंग’ की संज्ञा देते हैं.
प्राचीन भारत में जल संरक्षण केवल राजकीय दायित्व नहीं था. अनेक मंदिरों ने तालाब, कुएं, बावड़ियां, नहरें और सिंचाई प्रणालियां विकसित कीं. तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के अनेक ऐतिहासिक मंदिरों से जुड़े विशाल जलाशय आज भी उपयोग में हैं. चोल शासन के दौरान निर्मित सिंचाई नेटवर्क ने कावेरी डेल्टा को भारत के सबसे समृद्ध कृषि क्षेत्रों में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मंदिरों द्वारा धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, चिकित्सालय और यात्रियों के लिए विश्राम स्थल संचालित किए जाते थे. कई स्थानों पर अकाल और प्राकृतिक आपदाओं के समय मंदिर राहत केंद्र के रूप में भी कार्य करते थे.
इतिहासकारों का मानना है कि मंदिर-आधारित यह व्यवस्था केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसने स्थानीय शासन, सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास, रोजगार, सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक स्थिरता का एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया जिसने भारतीय समाज को सदियों तक आत्मनिर्भर बनाए रखा. आज ‘सामुदायिक विकास’, ‘सामाजिक पूंजी’ और ‘स्थानीय शासन’ जैसे जिन सिद्धांतों की चर्चा आधुनिक विकास मॉडल में की जाती है, उनके अनेक व्यावहारिक उदाहरण भारतीय मंदिर-गुरुकुल परंपरा में पहले से मौजूद थे.
वामपंथी इतिहासकारों ने जिस प्रकार से भारत की सांस्कृतिक चेतना को चोट पहुंचाई है उसका ख़ामियाज़ा पूरा देश भुगत रहा है और अगर समय रहते हम अपनी ज़ड़ों तक नहीं लौटे तो आगे भी भुगतना पड़ेगा. देश में अवैध रूप से बनी मंज़ारों और मस्जिदों पर कार्यवाई किए जाने पर दुख में रोने वाले वामपंथी मस्जिदों में चल रहे देश विरोधी कार्यों पर चुप्पी साध लेते हैं और मंदिरों को अपनी हिंदू विरोधी भावना के चलते निशाने पर रखते हैं.
जबकि सच्चाई यह है कि भारत की वास्तविक शक्ति केवल उसके मंदिरों में पूजा पद्धति से नहीं थी, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था में थी जिसमें मंदिर श्रद्धा के केंद्र थे, गुरुकुल ज्ञान के केंद्र थे और समाज दोनों का संरक्षक था. समाज ने मंदिरों को संसाधन दिए और मंदिरों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, अन्न, जल, संस्कृति, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के रूप में वे संसाधन समाज को वापस लौटाए. आज आवश्यकता किसी समुदाय की तुलना करने की नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत मॉडल से सीखने की है जिसने समाज को आत्मनिर्भर बनाया. यदि मंदिर, गुरुकुल, समाज और आधुनिक संस्थाएं पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और लोककल्याण के सिद्धांतों के साथ पुनः एक-दूसरे के पूरक बन सकें, तो यह केवल सांस्कृतिक पुनर्जागरण नहीं होगा, बल्कि विकसित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण सामाजिक निवेश भी सिद्ध होगा.
