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पश्चिमी अकादमिक जगत में हिंदूफोबिया

आज के आधुनिक युग में अकादमिक संस्थानों को विचारों की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और बौध्दिक संवाद का केंद्र माना जाता है. लेकिन हालिया कुछ दिनों में अकादमिक जगत में ‘हिंदूफोबिया’ एक अत्यन्त संवेदनशील विषय बनकर उभरा है. विशेष रूप से पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों और बौद्धिक मंचों पर हिंदू धर्म को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत करने का आरोप लग रहा है. अनेक भारतीयों ने लगातार यह आरोप लगाया है कि हिंदू धर्म को उसके वास्तविक दर्शन, आध्यात्मिकता और वैज्ञानिक चिंतन के स्थान पर जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास और कर्मकाण्ड तक समित कर दिया जाता है. लेकिन यह हिंदूफोबिया है क्या?

हिंदू धर्म, हिंदू परंपराओं, हिंदू ग्रंथों और हिंदू जनमानस के प्रति पूर्वाग्रह और रुढ़िवादिता के आधार पर फैलाए जाने वाली घृणा, उपहास और शत्रुतापूर्ण दृष्टि को ही हिंदूफोबिया कहते है. जिसका असर शोध पद्धति से लेकर राजनीतिक चर्चाओं तक होता है. सामान्यतः ऐसा देखा गया है हिंदू धर्म के प्रति पश्चिमी दुनिया में दोहरा मापदंड अपनाया जाता है, हिंदू धर्म के सकरात्मक पक्ष जैसे योग, उपनिषद, वेदांत दर्शन साहित्य सहिष्णुता और बहुलतावादी दृष्टिकोण की जगह  नकारात्मक पक्ष जैसे सती, जाति, अंधविश्वास को हिंदू धर्म का केंद्र माना जाता है. समस्या यह नहीं है कि नकारात्मक पक्ष में विचार विमर्श होता है, क्योंकि बुद्ध, स्वामी दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, जैसे चिंतको ने हिंदू धर्म की कमियों पर प्रश्न उठाए थे लेकिन सिर्फ कमियों को दिखाकर शोध पत्रों और वैचारिक विमर्श के माध्यम से घृणा फ़ैलाना यह उपेक्षाकृत और पक्षपाती माना जाएगा.

हिंदू‌फोबिया को अच्छे से समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है इसकी शुरुआत कहा से हुई? औपनिवेशिक काल में पश्चिमी इतिहासकारों ने भारतीय समाज और दर्शन को पिछड़ा और दमनकारी बताया. लॉर्ड मैकाले ने अपनी शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपराओं की निंदा की और यह दावा किया की ‘एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी भारत और अरब के संपूर्ण देशी साहित्य के बराबर है.’ और बाद में इसका परिणाम यह निकला भारतीय दर्शन, वेदांत, न्याय दर्शन, आयुर्वेद और संस्कृत साहित्य को पौराणिक और अवैज्ञानिक बताकर पश्चिमी ढांचे को श्रेष्ठ माना जाने लगा. परिणामस्वरूप 21वीं सदी में भी पश्चिमी दुनिया मकाले की विचारधारा पर ही चल रही है. आप में से कई लोगों के मन में प्रश्न यह भी उठा होगा कि पश्चिमी दुनिया किस प्रकार अकाद‌मिक संस्थानों में हिंदूफोबिया को फैलाती है. मूलतः देखा गया है हिंदू ग्रंथों को जब अनुवाद किया जाता है तब उसमें भारतीय संदर्भ को दरकिनार कर दिया जाता और साथ में यह भी प्रयास किया जाता है कि हिंदू धर्म को जातिगत और दमनकारी बताकर उस पर गर्व करने वाले को कट्टरपंथी और दमनकारी बता दो. इस संदर्भ का विस्तृत उल्लेख करने के लिए डॉ इंदू विश्वनाथन ने Endogeneous cycle of Hinduphobia’ की अवधारणा प्रस्तुत की है जिसमे उन्होंने बताया है कि कैसे पश्चिमी मीडिया, शैक्षणिक संस्थान मिलकर एक ऐसी छवि निर्मित करते हैं जिसका उद्देश्य हिंदू धर्म की छवि धूमिल करना होता है.  

और जब हम वेंडी डोनिगर जैसी अमेरिकन इंडोलोजिस्ट की हिंदू धर्म पर लिखी गई किताबों को पढ़ते हैं तो हमें दिखता है कि किस प्रकार उनका लेखन हिंदू धर्म की व्याख्या मुख्यत: मनोविश्लेषणात्मक यौन और सामाजिक संघर्षो के दृष्टिकोण से किया है. विशेष रूप से उनकी किताब The Hindus: An Alternatives History पर यह प्रश्नचिन्ह उठता कि उसमें हिंदू देवी देवताओं को अधार्मिक दिखाया गया है. और हां यह सिर्फ एक लेखक का उदाहरण नहीं है, कई ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जैसे शिकागो स्कूल ऑफ डिविनिटी से जुड़े प्रोफेसर पॉल कॉर्टराइट ने अपनी पुस्तक ‘Ganesa: Lord of Obstacles, Lord of Beginnings’ में भगवान गणेश और उनके सूंड की फ्रायडियन सिद्धांतों के आधार पर अत्यधिक आपत्तिजनक और कामुक व्याख्या की. रटगर्स यूनिवर्सिटी की इतिहासकार ऑड्रे ट्रश्के ने सोशल मीडिया और अकादमिक विमर्श में वाल्मीकि रामायण का हवाला देते हुए माता सीता और भगवान राम के संवादों पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया.

अभी कुछ दिनों पहले यूनिवर्सिटी ऑफ होस्टन में ‘लीवड हिंदू रीलीजन’ नामक पाठ्यक्रम के ख़िलाफ़ं पूरी दुनियाभर में विश्वविद्यालय की काफी निंदा हुई जिसमें हिंदू धर्म को अत्यधिक राजनीतिक और नकारात्मक दृष्टि से दिखाया गया था. यह सिर्फ अकादमिक हिंदूफोबिया का उदाहरण नहीं है बल्कि यह उस मानसिकता के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं जो हिंदू धर्म को नीचे दिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.

आज वैश्विक स्तर पर हिंदू छात्रों को अकसर अपनी धार्मिक पहचान के कारण विश्वविद्यालयों में समस्या का सामना करते देखा गया है. जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में छात्र संघ की अध्यक्ष चुनी गईं रश्मि सामंत को उनके हिंदू धर्म और अतीत के सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भारी ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था, जिसके कारण उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. और यह सिर्फ एक अकेला मामला नहीं है, जेम्स मिल से लेकर आज शेल्डन पोलॉक तक अनेक शिक्षाविद हिंदू धर्म को नीचा दिखाने का प्रयास करते आए हैं. आज यह स्थिति है कि यू.के में रहने वाले 51% हिंदू अभिभावको ने यह माना है कि उनके बच्चों को हिंदू धर्म के प्रति घृणा का सामना करना पड़ा है.

हिंदुओं से नफरत या यूं कहे हिंदूफोबिया का असर यह है कि वर्ष 2021 में एक आनलाइन आयोजन किया गया था जिसका शीर्षक था डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदूत्व’, जिसका उद्देश्य था वैश्विक हिंदुत्व की विचारधारा को नष्ट करना था. और सबसे बड़ी बात यह है कि 40 से अधिक विदेशी विश्वविद्यालयों ने इसमें हिस्सा लिया था. और यह सिर्फ एक आयोजन नहीं है, हिंदुत्व की नरसंहार राजनीतिः कंधमाल से मुजफ्फरनगर तक और कांग्रेस की ब्रीफिंग : अकादमिक स्वतंत्रता पर हिंदू वर्चास्ववादी हमले जैसे अनेक आयोजन हुए हैं जिनका उद्देश्य हिंदू विरोधी प्रोपेगेंडा को फैलाना था.

इन सभी प्रोपेगैंडा के ख़िलाफ़ समय-समय पर हिंदू संगठनों ने भी विभिन्न तरीके से पूरी दुनिया के सामने हिंदू धर्म के वास्तविक मर्म को रखने का प्रयास किया है. जिसका प्रत्यक्ष उदहरण ‘अंडरस्टैंडिंग हिंदुत्व और हिंदूफोबिया’ नामक एक वैश्विक सम्मेलन है जिसका उद्देश्य हिंदूफोबिया का खुलासा करना था. कई भारतीय लेखकों ने भी अपने लेखन के माध्यम से इस पूरी विचारधारा का पर्दाफाश किया है. उदहरण के रूप में, राजीव मल्होत्रा की किताब ‘भारत विखण्डन’ जिसमें उन्होंने विस्तार से उजागर किया है कि कैसे विदेशी फंड और पश्चिमी संस्थान भारत के दलित और द्रविड़ समाज में मनगढ़ंत दरारें पैदा करके देश को तोड़ने का प्रोपेगैंडा चला रहे हैं, सीताराम गोयल की किताब ‘हिंदू मंदिर: उनके उत्पीड़न का इतिहास’ इस प्रामाणिक शोध पुस्तक में उन्होंने इस्लामी इतिहासकारों के ही मूल दस्तावेजों का हवाला देकर अकादमिक इतिहासकारों के उस प्रोपेगैंडा को ध्वस्त किया, जो कहते थे कि भारत में बड़े पैमाने पर मंदिर नहीं तोड़े गए. प्रखर पत्रकार अरुण शौरी की किताब ‘इतिहास के प्रवृत्तकार’ में शौरी ने दस्तावेज़ी सबूतों के साथ यह दिखाया है कि कैसे भारत के वामपंथी इतिहासकारों के एक गुट ने एनसीईआरटी (NCERT) और अकादमिक संस्थानों पर कब्जा करके भारत के वास्तविक इतिहास को दबाया और आक्रमणकारियों का महिमामंडन किया.

यह लेख पढ़ते-पढ़ते आपके मन में भी यह विचार आ रहा होगा कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व के ख़िलाफ़ इतनी बढ़ी साजिश चल रही है और हमें आज तक पता नहीं चला. तो सोचिए कितने ऐसे लोग होंगे जिन्हें आज तक हिंदूफोबिया के बारे में ही पता नहीं होगा. आज यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम सभी अपनी संस्कृति, अपना धर्म और अपने विरासत को संभालकर रखे और इसको बढ़ावा दे ताकि आने वाली-पीढ़ी पर हिंदूफोबिया का असर कम से कम हो.

दूसरा पक्ष यह भी है कि किसी भी धर्म, समाज के नकरात्मक पक्ष को सामने रखना अकादमिक स्वतंत्रता का अधिकार है. और पश्चिमी जगत के कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि हिंदू धर्म के नकारात्मक पक्ष को सामने रखने वाला हर एक शोध को हिंदूफोबिया का नाम दे दिया जाता है. जो बात कुछ हद तक सही भी हो सकती है, लेकिन यह बात पूरी तरह से सच नहीं है क्योंकि अकादमिक स्वतंत्रता और धार्मिक तुष्टीकरण में बहुत बड़ा अंतर है. 2023 में अमेरिका के जॉर्जिया में राज्य की असेंबली और 2025 मे यूनाइटेड किंगडम के स्कॉटलैंड की संसद ने हिंदूफोबिया और हिंदू विरोधी कट्टरता की निंदा करने वाला एक आधिकारिक प्रस्ताव को पारित करके संपूर्ण पश्चिम समाज को यह संदेश दिया कि उनको भी अब औपनिवेशिक चश्मे को निकालकर हिंदू धर्म के सकारात्मक पक्ष को समन्वय की दृष्टि से अपना लेना चाहिए. आज पश्चिमी विश्वविद्यालयों को यह आवश्यकता है कि वे सिर्फ हिंदू धर्म के सामाजिक संघर्ष को नहीं बल्कि बहुआयामी दृष्टिकोण को भी सामने रखे. आज जब योग सम्पूर्ण विश्व को अपनी तरफ आकर्षित कर चुका है तब भारतीय ज्ञान, वेदांत, दर्शन और साहित्य को भी संतुलित ढंग से सभी के समक्ष प्रस्तुत करना होगा, तभी भविष्य में भारतीय दर्शन अपने वसुधैव कुटुम्बकम् के ध्येय के माध्यम से संपूर्ण विश्व को फिर से प्रकाशमान करेगा.

ओम सुनील तिवारी
ओम सुनील तिवारी
ओम सुनील तिवारी एक अन्तर्राष्ट्रीय वक्ता हैं जो विविध सभाओ में राष्ट्रियता पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं.