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भेदभाव का नया दौर

भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. एक ओर सामाजिक न्याय, समावेशिता और प्रतिनिधित्व की चर्चा हो रही है, तो दूसरी ओर राजनीति और नीति निर्माण का बड़ा हिस्सा जातीय गणित, वोट बैंक और पहचान-आधारित विमर्श के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है. ऐसे में एक प्रश्न उभर रहा है क्या सामान्य वर्ग भारतीय लोकतंत्र का नया ‘अदृश्य वर्ग’ बनता जा रहा है? यदि सामान्य वर्ग की उपेक्षा केवल एक धारणा होती, तो शायद इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं होती. लेकिन हाल के वर्षों में अनेक नीतिगत निर्णय, सरकारी योजनाएं, बजटीय प्रावधान, संस्थागत व्यवस्थाएं और विपक्षी दलों का उच्च जाति के प्रति विरोध का भाव इस बहस को नया आयाम देता दिखाई देता हैं. इससे समाज के एक वर्ग में यह भावना विकसित हुई है कि लोकतांत्रिक विमर्श में उनकी उपस्थिति तो है, परंतु उनकी समस्याएं और आकांक्षाएं प्राथमिकता का विषय नहीं हैं. क्या इसे नए ज़माने की अस्पृश्यता कहां जाना चाहिए ?

हाल ही में झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए संचालित छात्रवृत्ति योजना की सीटों को बढ़ाकर 50 कर दिया. इन 50 सीटों में 20 अनुसूचित जनजाति, 14 अन्य पिछड़ा वर्ग, 10 अनुसूचित जाति और 6 अल्पसंख्यक वर्ग के विद्यार्थियों के लिए निर्धारित की गईं. आश्चर्यजनक रूप से सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के लिए एक भी सीट निर्धारित नहीं की गई. यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि समान अवसर की अवधारणा के बीच सामान्य वर्ग को कब तक सरकारी योजनाओं से पूर्णतः बाहर रखा जाता रहेगा? क्या आर्थिक रूप से कमज़ोर सामान्य वर्ग के प्रतिभाशाली छात्रों की आकांक्षाएं राज्य की नीतिगत प्राथमिकताओं का हिस्सा नहीं हैं?

इस संदर्भ में बजट 2026–27 एक निर्णायक उदाहरण बनकर सामने आता है. पीआरएस इंडिया के विश्लेषण के अनुसार अनुसूचित जातियों के लिए 1.96 लाख करोड़, अनुसूचित जनजातियों के लिए 1.41 लाख करोड़ और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए 32,000 करोड़ का प्रावधान सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर किया गया है. इसके समानांतर, अल्पसंख्यकों के लिए ₹3,400 करोड़ का पृथक आवंटन किया गया है.

नीतिगत और संस्थागत स्तर पर भी इसी प्रकार की बहस देखने को मिलती है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी समता कानून में जिस तरह से सभी जातीय और धार्मिक समूहों को शामिल कर विशेष उपाय किए गए वहीँ जबकि सामान्य वर्ग को केवल एक अपराधी के रूप में देखा गया. इससे समाज के एक हिस्से में यह धारणा बनी कि नीतिगत विमर्श में सामान्य वर्ग को अधिकार-संपन्न समूह मान लिया गया है, जिसकी विशिष्ट चुनौतियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता.

वर्ष 2018 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में संशोधन के बाद पीड़ितों के लिए राहत राशि ₹85,000 से बढ़ाकर ₹8.25 लाख तक कर दी गई और जांच और सहायता की समय सीमाएं निर्धारित की गईं. इसी प्रकार, डॉ. अंबेडकर अंतरजातीय विवाह योजना के तहत अनुसूचित जाति और गैर-अनुसूचित जाति के बीच विवाह पर ₹2.5 लाख तक की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है. इन पहलों का उद्देश्य सामाजिक न्याय और समावेशन को बढ़ावा देना है, लेकिन आलोचक यह प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या कल्याणकारी हस्तक्षेपों का आधार केवल सामाजिक पहचान होना चाहिए या आर्थिक आवश्यकता और समान नागरिकता के सिद्धांतों को भी समान महत्व मिलना चाहिए. 2 जून, 2026 को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन से संबंधित चिकित्सा सहायता योजना के विस्तार की चर्चा सामने आई, जिसके अनुसार गंभीर बीमारियों, जैसे हृदय, गुर्दा, यकृत, कैंसर, मस्तिष्क, स्पाइन सर्जरी और प्रत्यारोपण, के लिए आर्थिक सहायता मुख्यतः अनुसूचित जाति/जनजाति समुदायों के उन परिवारों को उपलब्ध कराई जाती है जिनकी वार्षिक आय ₹5 लाख से कम है. आयकर अधिनियम की धारा 10(26) के तहत, 7 निर्दिष्ट राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के अधिसूचित क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के लोगों को उस क्षेत्र में अर्जित आय पर पूरी आयकर छूट मिलती है.

शिक्षा के क्षेत्र में भी लक्षित हस्तक्षेप लगातार बढ़े हैं. जनवरी 2026 में बिहार सरकार ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, आयुर्विज्ञान संस्थान, फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान और चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्थान जैसे प्रमुख संस्थानों में पढ़ने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों की पूरी फीस राज्य द्वारा वहन करने की घोषणा की. प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति दोगुनी और आईटीआई, डिप्लोमा व पेशेवर पाठ्यक्रमों के लिए सहायता बढ़ाई गई. राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूलों में अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए आरक्षण पहले से लागू था, जिसे वर्ष 2021–22 बढ़ाकर पिछड़े वर्ग के लिए भी लागू किया गया. इसके समानांतर, जामिया मिलिया इस्लामिया की विश्वविद्यालय अनुदान आयोग -वित्तपोषित रेज़िडेंशियल कोचिंग अकादमी में संघ लोक सेवा आयोग तैयारी के लिए अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति जनजाति और महिला पात्र हैं, लेकिन सामान्य और अन्य पिछड़ा वर्ग पुरुष नहीं जो अवसर की समानता पर एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करता है.

मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को 11वीं से लेकर पीएचडी तक छात्रवृत्ति प्रदान की जा रही है. हरियाणा नागरिक उड्डयन विभाग की वेबसाइट के अनुसार, प्राइवेट पायलट लाइसेंस प्रशिक्षण हेतु सामान्य वर्ग एवं अन्य स्वयं-वित्तपोषित अभ्यर्थियों को ₹9,000 प्रति घंटा शुल्क देना होगा, जबकि अनुसूचित जाति/जनजाति अभ्यर्थियों के प्रशिक्षण का खर्च सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय वहन करेगा. ओडिशा में जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग छात्रों के लिए 235 नए छात्रावास, बिहार में अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग छात्राओं के लिए 200 करोड़ की लागत से 38 छात्रावास, तेलंगाना में दलितों के लिए विशेष विश्वविद्यालय और देशभर में 150 अंबेडकर नवोदय विद्यालय. 2026 में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जमशेदपुर के बुक बैंक से संबंधित एक विवाद चर्चा में आया, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि अनुसूचित जाति /जनजाति छात्रों को 15 पुस्तकें और सामान्य वर्ग को 2 पुस्तकें उपलब्ध कराई जा रही हैं.

रोज़गार और उद्यमिता के क्षेत्र में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है. स्टैंड-अप इंडिया योजना के तहत प्रत्येक बैंक शाखा को कम-से-कम एक अनुसूचित जाति या जनजाति उद्यमी तथा एक महिला उद्यमी को ₹10 लाख से ₹1 करोड़ तक का ऋण देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया. मुद्रा योजना के तहत 55.45 करोड़ खातों में ₹36.18 लाख करोड़ वितरित हुए, जिनमें से अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के 33.4 करोड़ खातों को ₹15.6 लाख करोड़ मिले. जनवरी 2026 में केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदाय के 11,452 उद्यमियों को लगभग ₹269 करोड़ की औद्योगिक प्रोत्साहन सहायता प्रदान की.

सरकारी खरीद नीति में भी इन समुदायों के उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। केंद्र सरकार की सार्वजनिक खरीद नीति, जिसमे सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों की खरीद में अनुसूचित जाति/जनजाति उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए विशेष आरक्षण प्रावधान किए गए. आंध्र प्रदेश सरकार ने जनवरी 2026 में अनुसूचित जाति जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग उद्यमियों के लिए 300 करोड़ की दूसरी किस्त जारी की. मध्य प्रदेश की रोज़गार नियोजन योजना 2025 के तहत हर वर्ष 600 अन्य पिछड़ा वर्ग युवाओं को जापान सहित अन्य देशों में प्रशिक्षण और रोजगार के लिए भेजा जा रहा है. साथ ही, शौर्य संकल्प योजना के अंतर्गत अन्य पिछड़ा वर्ग के लगभग 5,000 छात्रों को प्रति वर्ष संभाग मुख्यालयों पर निःशुल्क अर्धसैनिक बल प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इसके साथ ही जाति के आधार पर अलग-अलग संवैधानिक आयोगों की व्यवस्था भी मौजूद है, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, जनजाति आयोग और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, जो यह दर्शाता है कि नीति, संस्थान और संसाधन वितरण में जाति एक केंद्रीय आधार बन चुकी है.

जब आंकड़े खुद बोलते हैं, तो विमर्श भावनात्मक नहीं, नीतिगत होना चाहिए. 2019–23 में केंद्रीय विश्वविद्यालयों से ड्रॉपआउट्स में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (13,626) और सामान्य वर्ग (12,825) लगभग बराबर हैं. 2016–19 के बीच 67% सामान्य वर्ग के छात्रों ने शिक्षा ऋण लिया, जबकि प्रत्यक्ष करों में उनका योगदान 62% है, आबादी 16% से कम होने के बावजूद. कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (2024–25) के अनुसार शीर्ष नौकरशाही (ग्रुप ए) में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी 40%, देश की निचली अदालतों में 46 प्रतिशत न्यायाधीश अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं. राज्यवार स्थिति और अधिक स्पष्ट है, तमिलनाडु में लगभग 97 प्रतिशत, कर्नाटक में 88 प्रतिशत, केरल में 88 प्रतिशत, तेलंगाना में 69 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 54 प्रतिशत न्यायाधीश आरक्षित वर्गों से आते हैं. वहीँ जनवरी 2026 की राजस्थान पुलिस भर्ती में 968 में से सामान्य वर्ग की 292 सीटों पर केवल दहाई में चयन और उज्ज्वल राणा जैसी घटनाएं, जहां ₹7,000 फीस न भर पाने पर के बाद आत्मदाह कर लिया गया, यह सवाल और तीखा करती हैं कि क्या नीति सचमुच वंचना घटा रही है या नई असमानताओं को संस्थागत रूप दे रही है.

1950 में अनुसूचित जाति सूची में लगभग 607 जातियां थीं, जो आज बढ़कर लगभग 1200 तक पहुंच चुकी हैं. इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति की सूची 241 जनजातियों से बढ़कर लगभग 744 हो गई है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची 3000 से बढ़कर 5000 से अधिक जातियों तक पहुंच चुकी है. यह विस्तार दर्शाता है कि समय के साथ अधिक से अधिक समुदाय सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण ढांचे में शामिल हुए हैं. दूसरी ओर, बेरोज़गारी और आर्थिक दबाव से जुड़े आंकड़े भी इस विमर्श को जटिल बनाते हैं. 2023-24 के कुछ सर्वेक्षणों में बेरोज़गारी दर सामान्य वर्ग में 3.8 प्रतिशत, अनुसूचित जाति में 3.3 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग में 3.1 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति में 1.9 प्रतिशत बताई गई. वहीं 2016-19 के दौरान सामान्य वर्ग के लगभग 67 प्रतिशत छात्रों द्वारा शिक्षा ऋण लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के आंकड़े भी सामने आए. ये तथ्य इस धारणा को चुनौती देते हैं कि आर्थिक संकट केवल आरक्षित वर्गों तक सीमित है?

इन सभी आंकड़ों, वितरित धनराशियों और संरचित विषमताओं के बीच एक सवाल उठता है क्या सामान्य वर्ग को जानबूझकर वंचित किया जा रहा है? या यह सब सामान्य वर्ग से राजनैतिक छुआछूत का परिणाम है? जब नीतियां संसाधनों और प्रतिनिधित्व के संतुलन की बजाय किसी एक वर्ग को निरंतर अदृश्य बनाती हैं, तो यह ‘समानता’ नहीं, बल्कि सुनियोजित अस्पृश्यता है. कब तक सामान्य वर्ग को समानता और पीड़ित के नाम पर शोषित किया जाएगा.

देश की कुल आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा सामान्य वर्ग से आता है. इसमें किसान, कर्मचारी, छोटे व्यापारी, पेशेवर, विद्यार्थी और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार बड़ी संख्या में शामिल हैं. इसके बावजूद चुनावी घोषणापत्रों, राजनीतिक अभियानों और कल्याणकारी विमर्श में यह वर्ग शायद ही कभी एक विशिष्ट नीति-समूह के रूप में दिखाई देता है. वास्तविक चिंता किसी विशेष वर्ग को मिले अधिकारों या अवसरों से नहीं है. चिंता इस बात की है कि क्या भारतीय राज्य और राजनीति धीरे-धीरे ऐसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं जहां सामान्य वर्ग के गरीब, निम्न-मध्यम वर्गीय और संघर्षरत परिवार नीति-निर्माण की दृष्टि से अदृश्य होते जा रहे हैं? यदि सामाजिक न्याय का अर्थ कुछ वर्गों के उत्थान के साथ-साथ अन्य वर्गों की पूर्ण उपेक्षा बन जाए, तो यह समानता की मूल भावना पर पुनर्विचार का विषय है.

लोकतंत्र का उद्देश्य किसी भी वर्ग को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास दिलाना है कि उसकी समस्याएं, उसकी आकांक्षाएं और उसका भविष्य भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा हैं. जब किसी वर्ग को बार-बार यह अनुभव होने लगे कि योजनाओं, छात्रवृत्तियों, आर्थिक सहायता और राजनीतिक संवाद में उसके लिए स्थान लगातार सिकुड़ रहा है, तब ‘राजनीतिक अस्पृश्यता’ जैसी अवधारणाएं जन्म लेने लगती हैं. क्योंकि एक सशक्त लोकतंत्र की पहचान केवल यह नहीं है कि वह किन्हें लाभ पहुंचाता है, बल्कि यह भी है कि वह किसी नागरिक को स्वयं को उपेक्षित महसूस करने से किस हद तक बचा पाता है.

गजेंद्र सिंह
गजेंद्र सिंह
गजेंद्र सिंह एक लेखक, लोक नीति विश्लेषक, एवं सामाजिक विकास क्षेत्र के पेशेवर हैं, जिनके पास शासन, शिक्षा, नेतृत्व विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव है.