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झारखंड की डेमोग्राफी पर मंडराता ख़तरा

जब भी हम भारत में अवैध बांग्लादेशियों की घुसपैठ, बढ़ती मुस्लिम आबादी और धड़ल्ले से चलते धर्मांतरण की बात करते हैं तो सबसे पहले हमें पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों, जो कि बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए राज्य हैं, का ही नाम ही ज़ेहन में आता है. लेकिन पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे झारखंड का हाल भी बंगाल से बहुत ज़्यादा अच्छा नहीं है. आदिवासी पहचान के आधार पर बना यह राज्य किस तरह से इन घुसपैठियों और मिशनरियों के चंगुल में फंस गया, इसपर उतनी चर्चा नहीं होती जितनी होनी ज़रूरी है. राज्य की हेमंत सोरेन सरकार लगातार वोटबैंक और मुस्लिम तुष्टीकरण के चक्कर में जान बूझकर राज्य की डेमोग्राफी बदलने की कोशिश कर रही है. उनकी यह कोशिश पूरे देश के लिए कितनी घातक है इसका अंदाज़ा लगाए बिना वे राज्य को मुस्लिम कट्टरपंथियों और केरल के ईसाई मिशनरियों के हाथों में सौंपे हुए है.

झारखंड राज्य को बने हुए 25 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है. 15 नवंबर 2000, को जब यह देश के 28वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, तब यहां के लोगों ने एक नए भविष्य की कल्पना की थी. झारखंड वासियों द्वारा एक अलग राज्य की मांग वर्षों से की जा रही थी. अलग राज्य की मांग केवल बेहतर प्रशासन या शासन व्यवस्था के लिए नहीं की गई थी, बल्कि इसके मुख्य उद्देश्यों में स्थानीय लोगों के अधिकार, आदिवासी पहचान का संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों पर उनका हक शामिल था. राज्य का बनना वर्षों के लंबे संघर्ष और जनआंदोलन का परिणाम था, जिसमें लोगों द्वारा अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई गई थी. उस समय प्रदेश के लोगों को यह आशा थी कि राज्य बनने के बाद यहां की खनिज संपदा, जल, जंगल और ज़मीन का लाभ सबसे पहले झारखंड के लोगों को मिलेगा, आदिवासी परंपराओं और संस्कृति को मज़बूत संरक्षण प्राप्त होगा तथा रोजी रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे और राज्य तरक्की का राह पर होगा, जिससे वर्षों से उपेक्षित इस क्षेत्र को अपनी अलग और सशक्त पहचान बनाने का अवसर मिलेगा.

झारखंड बनने पर लोगों ने जो सपने देखे थे, राज्य की असलियत ने उन पर पानी फेर दिया. अलग राज्य बनते ही यह विकास का जरिया बनने के बजाय राजनीति का अखाड़ा बन गया. शुरुआती सालों में तो यहां नेताओं के बीच कुर्सी की ऐसी खींचतान चली कि कुछ वक़्त में ही सरकार बदल जाया करती थी. कभी जोड़-तोड़ की राजनीति हुई, तो कभी गठबंधन का चक्कर जहां कोई दल एक गठबंधन से निकल कर दूसरे में शामिल हो जाता और सरकार बदल जाती. इन सब के बीच सबसे दिलचस्प वाकया यह रहा कि झारखंड हमारे देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां एक निर्दलीय विधायक (मधु कोड़ा) को भी मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला.

अवसरवाद के इस राजनीतिक खेल का नतीजा यह हुआ कि जिन बड़े मुद्दों पर काम होना चाहिए था, उन्हें नेताओं ने अपनी सियासत की भेंट चढ़ा दिया. राज्य के लोग एक अदद स्थिर सरकार के लिए वर्षों तक तरसते रहे. इस पूरे सियासी ड्रामे का सीधा असर सरकारी कामकाज पर पड़ा, विकास के सारे दावे हवा हो गए और राज्य का यह हाल देखकर बाहर के निवेशक भी यहां आने से कतराने लगें.

झारखंड को प्राकृतिक संसाधनों के मामले में देश के सबसे समृद्ध राज्यों में माना जाता है. कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, तांबा, यूरेनियम समेत अनेक मूल्यवान खनिजों के विशाल भंडार यहां मौजूद हैं. देश के औद्योगिक विकास में भी झारखंड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसके बावजूद विडंबना यह है कि राज्य के अनेक जिले आज भी गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, खराब स्वास्थ्य सेवाओं और आधारभूत सुविधाओं की कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.

ऐसे में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि अपार प्राकृतिक संपदा के बावजूद झारखंड विकास की दौड़ में अपेक्षित गति क्यों नहीं पकड़ सका. इस स्थिति के पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं, जिनमें भ्रष्टाचार, प्रशासनिक कमजोरियां और खनिज संसाधनों के अनियंत्रित दोहन को प्रमुख माना जाता है. लंबे समय से अवैध खनन, भूमि विवादों और विभिन्न घोटालों की खबरें राज्य की छवि को प्रभावित करती रही हैं. यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोगों के मन में यह धारणा बनी है कि झारखंड की धरती से निकलने वाली संपदा का लाभ उस स्तर तक स्थानीय जनता तक नहीं पहुंच पाया, जिसकी उम्मीद राज्य के गठन के समय की गई थी.

कई वर्षों के राजनीतिक उठापटक के बाद जब झारखंड में एक स्थिर सरकार की स्थापना हुई तो ऐसा लगा मानो अब इस राज्य के दिन फिरने वाले हैं, अब यहां विकास होगा. लोगों को लगा कि अब शायद उनके सपनों, उनकी उम्मीदों को पूरा किया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

एक तरफ जहां प्राकृतिक खनिज संपदा से भरपूर इस राज्य की भोली-भाली आम जनता विशेष तौर पर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समाज के लोग अपने परिवार की आजीविका को चलाने के लिए संघर्षरत हैं. वे अपने और अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दिन-रात कड़ा संघर्ष कर रहे हैं. बुनियादी सुविधाओं के अभाव में आज भी अपनी पहचान और वजूद को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

वहीं दूसरी तरफ, इस मजबूरी और लाचारी का फायदा उठाकर सालों से यहां अवैध रूप से धर्मांतरण का खेल खेला जा रहा है. सुदूर इलाकों और गांवों में ईसाई मिशनरियों द्वारा सीधे-साधे आदिवासी लोगों को तरह-तरह के प्रलोभन और लालच देकर बड़े पैमाने पर ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का काम धड़ल्ले से चल रहा है. लंबे समय से सुनियोजित तरीके से चल रहे इस धर्मांतरण के कारण अब राज्य की मूल आदिवासी संस्कृति, उनकी प्राचीन परंपराओं और अनूठी पहचान पर एक गंभीर खतरा मंडराने लगा है.

इसके साथ ही, पूरे झारखंड में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ती तादाद आज एक बेहद गंभीर संकट बन चुकी है. खास तौर पर संथाल परगना क्षेत्र में इन घुसपैठियों का एक पूरा नेटवर्क काम कर रहा है. झारखंड में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) जैसे कड़े भूमि कानून लागू हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों की ‘जल, जंगल, जमीन’ और उनकी पहचान को कानूनी संरक्षण देना है. इन कानूनों के तहत किसी गैर-आदिवासी के लिए आदिवासियों की ज़मीन खरीदना या हड़पना कानूनी रूप से असंभव है. इसी कानूनी कड़ाई को तोड़ने के लिए अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों ने एक बेहद शातिर और सोची-समझी रणनीति अपनाई है. वे यहां के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों की भोली-भाली युवतियों को अपने जाल में फंसाकर उनसे शादी कर लेते हैं. इस विवाह के पीछे उनका मकसद कोई पारिवारिक संबंध बनाना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘लैंड जिहाद’ या भूमि हड़पने की मंशा होती है.

चूंकि कानूनन ज़मीन आदिवासी महिला के नाम पर ही रह सकती है, इसलिए ये घुसपैठिए अपनी पत्नियों के नाम का इस्तेमाल एक मुखौटे के रूप में करते हैं. यही कारण है कि आज संथाल परगना के क्षेत्र में जगह जगह जमाई टोला नाम से गांव बस गए हैं, जहां इन घुसपैठियों की उपस्थिति साफ देखी जा सकती है. इस तरह के कई तथाकथित जमाई टोला के विषय पर कई राष्ट्रीय एवं स्थानीय मीडिया द्वारा समय समय पर ग्राउंड रिपोर्टिंग के माध्यम से अवगत कराया गया है. आज स्थिति यह है कि इन अवैध बांग्लादेशियों के कारण संथाल परगना की डेमोग्राफी ही बदलती जा रही है, जिसके मद्देनजर झारखंड उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका (डेनियल दानिश बनाम झारखंड राज्य) पर सुनवाई करते हुए इसे देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर ख़तरा माना है. उच्च न्यायालय ने भी इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है और राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों से इस मुद्दे पर जवाब तलब किया गया है.

झारखंड में चल रहे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का कोई सरकारी आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है परंतु विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा इसे लेकर समय-समय पर आवाज़ उठाई जाती है. पूरे झारखंड में, विशेष रूप से संथाल परगना के क्षेत्र में घुसपैठ की स्थिति काफी चिंताजनक हो गई है. अभी हाल ही में भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने भी अवैध बांग्लादेशियों के मुद्दे पर अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए बताया कि संथाल परगना क्षेत्र में मुस्लिम आबादी हाल के वर्षों में बहुत तेजी बढ़ी है, जो कि समान्य वृद्धि दर से कहीं ज्यादा है. उन्होंने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ को इसका मुख्य कारण बताते हुए केंद्र सरकार से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू करने की मांग की है.

आगे उन्होंने कहा कि घुसपैठ की समस्या केवल एक राज्य के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए यह एक गंभीर चुनौती है. उन्होंने कहा कि जिस तरह से असम सरकार घुसपैठियों पर कड़ी कार्रवाई करते हुए नकेल कसने का काम कर रही है वैसी ही कार्यवाई झारखंड में भी किया जाना चाहिए. अपने दावों के समर्थन में उन्होंने आज़ादी के बाद से अब तक के कुछ चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए, जो इस प्रकार हैं:

संताल परगना और पूरे झारखंड में जनसंख्या के बदलते समीकरण को अगर आंकड़ों के नज़रिए से देखें, तो आज़ादी के बाद से यहां की डेमोग्राफी में बहुत बड़े और चौंकाने वाले बदलाव हुए हैं. वर्ष 1951 में जहां पूरे झारखंड में आदिवासियों की हिस्सेदारी 35.38 प्रतिशत थी, वहीं 2011 तक आते-आते यह घटकर 26.20 प्रतिशत रह गई. इसके विपरीत, इसी अवधि में राज्य में मुस्लिम आबादी 8.09 प्रतिशत से बढ़कर 14.53 प्रतिशत हो गई. यह बदलाव संताल परगना क्षेत्र में और भी ज्यादा चौंकाने वाला है, जहां 1951 में आदिवासियों की आबादी 44.67 प्रतिशत हुआ करती थी, जो 2011 में सिमटकर महज 28.11 प्रतिशत पर पहुंच गई. वहीं दूसरी ओर, संताल परगना में 1951 में मुस्लिम समाज की आबादी जो केवल 9.44 प्रतिशत थी, वह 2011 की जनगणना में बढ़कर 22.73 प्रतिशत दर्ज की गई.

हेमंत सोरेन सरकार इन दावों को सिरे से नकारती आ रही है और इसे भाजपा की ‘धर्म की राजनीति’ का नाम दे रहा है. सरकार के इस रवैए से एक बात तो साफ है कि इन घुसपैठियों को कहीं ना कहीं सरकार का मौन समर्थन प्राप्त है, जिससे ये राज्य में बड़े आराम से फल और फूल रहे हैं.

वहीं दूसरी ओर यदि हमें झारखंड में चल रहे धर्मांतरण के खेल को बेहतर ढंग से समझना है तो हमें जनसंख्या के आंकड़ों को समझना होगा. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड में ईसाई धर्मावलम्बियों  की संख्या करीब 14.20 लाख थी, जो पूरे राज्य की कुल आबादी का लगभग 4.3% बनती है. हालांकि पूरे राज्य के स्तर पर यह आंकड़ा दिखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन झारखंड के कुछ खास जिलों में ईसाई समुदाय की आबादी का अनुपात काफी ज्यादा है.

​खासकर दक्षिणी झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में ईसाई समुदाय की मौजूदगी और प्रभाव काफी साफ दिखाई देता है. उदाहरण के लिए, सिमडेगा जिले की लगभग आधी आबादी ईसाई धर्म को मानने वाली है. इसके अलावा खूंटी और गुमला जैसे आदिवासी बहुल जिलों में भी इनकी संख्या राज्य के औसत (4.3%) से कहीं अधिक है.

​आंकड़ों और शोध के विश्लेषण बताते हैं कि 1991 से 2011 के दो दशकों के दौरान, कुछ आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई समुदाय की जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार सामान्य आबादी की तुलना में काफी तेज़ थी. इसी दौर में इन क्षेत्रों में चर्च और मिशनरी संस्थाओं जाल पूरी तरह से फैल चुका था,जिसे लेकर राज्य के सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर अक्सर चर्चा और विवाद होते रहे हैं. हालांकि राज्य में आदिवासियों द्वारा धर्म परिवर्तन कर के ईसाई बनने की रफ्तार सरकारी आंकड़ों से कई गुना ज्यादा है. ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि लोग धर्म परिवर्तन कर के ईसाई बन चुके हैं परंतु सरकार की तरफ से जनजातियों को मिलने वाले विभिन्न लाभों को लेने के लिए वे लोग सरकारी दस्तावेज़ों में खुद को आदिवासी(जनजाति) का बताते हैं. और अब ऐसे ही लोगों के ख़िलाफ़ डीलिस्टिंग की आवाज़ प्रबल होने लगी है.

आजकल झारखंड में एक और मुद्दा काफी गरमाया हुआ है और वो हैं “डीलिस्टिंग” का मुद्दा. विभिन्न आदिवासी समुदायों के वे लोग जिन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है और अब वे ईसाई या किसी अन्य धर्म में शामिल हो गए हैं, उन्हें संविधान के तहत अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर कर दिए जाने की मांग की जा रही है. डीलिस्टिंग के पक्ष में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध वर्ग के लोग शामिल हैं, जिनमें आईआरएस अधिकारी निशा उरांव और सामाजिक कार्यकर्ता एवं झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा की सदस्य निशा कुमारी भगत का नाम प्रमुख रूप से शामिल है. डीलिस्टिंग के पक्ष में इनका कहना है कि जिन लोगों ने धर्मपरिवर्तन कर के सरना मत को छोड़ दिया है और किसी अन्य मत को अपना लिया है वैसे लोगों को जनजातीय अधिकारों को वापस लिया जाना चाहिए और उन पर सिर्फ सरना मत को मानने वालों का ही अधिकार होना चाहिए. ऐसे लोग जो सरना मत का त्याग कर चुके हैं वे लोग मूल रूप से सरना मत को मानने वाले विभिन्न जनजातियों का हक मार रहे हैं.

निशा उरांव विभिन्न मंचों पर यह विचार व्यक्त कर चुकी हैं कि आदिवासी परंपराएं और भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धारा एक-दूसरे से गहरे रूप से जुड़ी रही हैं. वहीं निशा भगत का कहना है कि डीलिस्टिंग की मांग को किसी धर्म के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे आदिवासी समाज की अस्मिता, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न के रूप में समझना चाहिए.

वहीं दूसरी ओर जिन लोगों ने धर्मांतरण कर लिया है वे लोग डीलिस्टिंग का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद की आस्था अपनाने और उसका पालन करने की पूरी स्वतंत्रता देता है. उनके अनुसार धर्म व्यक्ति का निजी विषय है और किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार धर्म चुनने का अधिकार होना चाहिए.

यही वजह है कि प्रदेश में धड़ल्ले से हो रहे धर्मांतरण को रोकने के लिए कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा रही है बल्कि उल्टा ऐसा लगता है कि ईसाई मिशनरियों को सरकार का समर्थन प्राप्त है. इसलिए ये मिशनरियां बड़े आराम से फैल रहे हैं.

धर्मांतरण से जुड़े विवाद हाल के समय में अदालतों तक पहुंचे हैं, जिसके कारण इस विषय पर कानूनी और संवैधानिक दृष्टिकोण से बहस और गंभीर हो गई है. माननीय न्यायालयों ने अपने विभिन्न फैसलों और टिप्पणियों में स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान हर व्यक्ति को अपनी इच्छा से किसी भी धर्म को मानने और उसके अनुसार आचरण करने का अधिकार देता है. हालांकि, न्यायपालिका ने यह भी साफ किया है कि यदि डरा-धमकाकर, धोखे से या लालच देकर किसी का धर्म बदला जाता है, तो ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्रवाई बेहद ज़रूरी है.

इन्हीं न्यायिक दिशानिर्देशों के बीच झारखंड में भी इस मसले पर नए सिरे से विमर्श शुरू हो गया है. सूबे के कई आदिवासी और सामाजिक संगठनों का मानना है कि इस गंभीर विषय पर केवल राजनीतिक बयानबाजी करने से कोई हल नहीं निकलेगा. उनका ज़ोर इस बात पर है कि मौजूदा कानूनों को कड़ाई और निष्पक्षता से लागू किया जाए, आने वाली शिकायतों की पूरी पारदर्शिता के साथ जांच हो और एक ऐसा मजबूत तंत्र बनाया जाए जो इस तरह की किसी भी अवैध गतिविधि पर कड़ी नज़र रख सके.

झारखंड की वर्तमान झामुमो और कांग्रेस गठबंधन सरकार पर इस बेहद गंभीर मुद्दे को लेकर लगातार वोट बैंक की तथा तुष्टिकरण की राजनीति करने के आरोप लगतो रहे हैं. आलोचकों और विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार इस गंभीर संकट को पूरी तरह से खारिज करके राज्य की आंतरिक सुरक्षा और मूल आदिवासियों के अस्तित्व के साथ खिलवाड़ कर रही है. जब भी अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ या सुनियोजित धर्मांतरण का मुद्दा उठता है, तो सरकार और इरफान अंसारी जैसे उनके मंत्री इसे ‘चुनावी स्टंट’ या ‘सांप्रदायिक ध्रुवीकरण’ का नाम देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं.

धर्मांतरण एवं अवैध बांग्लादेशियों के घुसपैठ की दोहरी चुनौतियों से राज्य जूझ रहा है और प्रदेश की हेमंत सरकार ने एक अजीब सी चुप्पी साध रखी है, मानो उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा हो. हेमंत सोरेन और कांग्रेस अपने सुरक्षित वोट बैंक को बचाए रखने के लिए इस ख़तरनाक डेमोग्राफिक बदलाव पर न सिर्फ जानबूझकर मूकदर्शक बने हुए हैं बल्कि इसे बढ़ावा भी दे रहे हैं, जिससे न केवल आदिवासियों की जमीनें और राजनीतिक अधिकार छिन रहे हैं, बल्कि झारखंड आंदोलन की वह मूल भावना भी दम तोड़ रही है जिसके लिए अलग राज्य का गठन किया गया था.

प्रदेश की सरकार का राज्य की आंतरिक एवं सामाजिक सुरक्षा के प्रति ऐसा ढुलमुल रवैया कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि जहां सत्ता का मोह नागरिकों की सुरक्षा से बढ़कर हो, जहां वोट बैंक की राजनीति के आगे नागरिकों की सुरक्षा एवं उनका भविष्य ताक पर रख दिया जाए तो सरकार की इस तरह की चुप्पी हैरान नहीं करती है.

झारखंड का भविष्य और उसकी विकास की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वहां की सरकार अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों की समस्या से कैसे निपटती है और धर्मांतरण की चुनौतियों के ख़िलाफ़ क्या ठोस कदम उठाती है. यदि शासन वास्तव में आदिवासी समाज का कल्याण और उनके हितों की रक्षा करना चाहता है, तो उसे राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए इन संवेदनशील और गंभीर मुद्दों का शीघ्रता से स्थायी समाधान खोजना होगा.यदि समय रहते इन गंभीर समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले वक्त में झारखंड की आंतरिक सुरक्षा एवं संस्कृति के लिए ये काफी घातक हो सकती है.

शालिनी कौशिक
शालिनी कौशिक
शालिनी कौशिक एक अनुभवी फ्रीलांस कंटेंट राइटर और शिक्षिका हैं, जिन्हें मीडिया और राइटिंग के क्षेत्र में 6 से अधिक वर्षों का अनुभव है.