बीते कुछ सालों में भारत में हिंदुओं को अपने त्यौहार मनाने की एक बड़ी कीमत देनी पड़ रही है. ऐसा कोई जुलूस, यात्रा, जश्न नहीं रहा जहां मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा हिंसा, मारकाट या पत्थरबाज़ी न की गई हो. बड़ी संख्या में सुरक्षा बल तैनात करने के बाद भी त्योहारों में खलल डालने का कुछ लोगों का जुनून आसमान पर ही रहता है. इसी साल दो त्योहारों पर दो निर्मम घटनाएं देखिने को मिली, होली पर रंग की जगह तरुण खटीक का खून बहाया गया और ईद पर सूर्य चौहान की कुर्बानी दी गई.
दिल्ली के एक महौल्ले में किसी मुस्लिम महिला पर छोटी बच्ची से थोड़ा रंग गिर गया और वहीं गाजियाबाद में मुस्लिम दोस्त ने हिंदू दोस्त का थोड़ा-सा खून गली में बहा दिया. दोनों ही घटनाओं में लगभग सारी बातें एक समान हैं: मरने वाले का धर्म, एनकाउंटर और उसके बाद में फैली भ्रांतियां. उसके बाद भी हिंदू समाज की आंखें न खुलना.
इस साल 3 मार्च को पूरे देश में होली का त्योहार मनाया गया. हिंदुओं का त्योहार हो और वह त्योहार का दिन शांति से बीत जाए, ऐसा होना अब दुर्लभ ही नहीं असंभव ही दिखता है.
खबर आई कि दिल्ली के उत्तम नगर में एक नौजवान की निर्मम हत्या हो गई है इसीलिए क्योंकि उसके परिवार की एक छोटी बच्ची से गलती से एक बुर्का पहनी एक मुस्लिम महिला पर होली के दिन गलती से पानी गिर गया. मामला बढ़कर आपसी लड़ाई तक जा पहुंचा और मुस्लिम पक्ष की ओर से तरुण की हत्या के बाद ही शांत हुआ.
इसके बाद मारने वाले युवक का एनकाउंटर हो गया, उसके घर पर बुलडोजर चल गया और सबसे ज़रूरी तरुण के लिए मस्जिद से दुआ पढ़ने का दिखावा हो गया ताकि मीडिया कवरेज से मुस्लिम समाज की छवि साफ दिखाई जा सके.
उसके 2 महीने बाद ही एक और त्योहार आया. अबकी बार हिंदुओं का नहीं मुस्लिमों की ईद. फिर एक निर्मम हत्या हुई. पता चला कि सिर्फ घटना अलग है पैटर्न वही है. गाजियाबाद के सूर्या चौहान का उसके मुस्लिम दोस्त के साथ झगड़ा हो गया जिस पर उसके अब्बू ने इसका बदला ईद पर लेने के लिए कहा. खैर, ईद आई और सूर्या के मुस्लिम दोस्त ने उससे पूछा कि उसने कभी बकरे की कुर्बानी होते हुए देखी है. दोस्त के साथ जाते हुए सूर्या ने जो भी सोचा हो, ये तो नहीं सोचा होगा कि दोस्ती में वही बकरा है और उसकी ही कुर्बानी दे दी जाएगी. इस घटना में फिर एक हिंदू मर गया.
कालचक्र फिर चला, मारने वाले युवक का एनकाउंटर हो गया, उसके घर पर बुलडोजर चल गया और घटना के 6 दिन बाद कोई मुल्सिम महिला सूर्या के घर परिवार को सांत्वना देने आई. खैर, इस देश के लोग अपने मन को मनाने के लिए ऐसी ही सांतवनाओं से शांत होते रहेंगे. ऐसी ओर घटनाएं आती रहेंगी और शायद एक दिन हार कर हताशा में मैं भी इन पर लिखना छोड़ दूंगा.
लेकिन एक बात जो मुझे हमेशा से हैरान करती आई है वह है हिंदू समाज का अंधापन. हर साल ऐसी निर्मम हत्याएं होती रहती हैं. समाज मे दूर-दूर तक कोई आक्रोश दिकाई नहीं देता. हम व्यक्तिगत और एक समाज के तौर पर इससे क्या सीख लेते हैं? चुप रहना, ‘नफ़रती-चिंटू’ के लेबल से बचना और आगे बढ़ जाना.
दोनों ही घटनाओं के बाद आस-पास का हिंदू समाज अचानक से जाग गया, न्याय के लिए सड़क पर भी आ गया. कुछ ही दिनों में फिर सब पहले जैसा हो जाता है. फिर कोई ऐसी ही अप्रिय निर्मम हत्या होती है, किसी ओर जगह पर, किसी और जाति के हिंदू के साथ और किसी और कहा-सुनी पर.
कुछ घंटों, कुछ दिनों के लिए वहां का हिंदू समाज फिर जागता है और सड़कों पर आ जाता है. विरोध करने की खानापूर्ति करता है और घर जाकर सो जाता है.
सवाल यह है कि क्या नज़रंदाज स्वभाव के हिंदू समाज को कुछ दिनों और कुछ घंटों जगाने के लिए ऐसी कितनी कुर्बानियां होती रहेंगी? एक समाज के तौर पर हम इससे क्या सीख ले रहे है?
पूरी जिंदगी धार्मिक सद्भावना में अंधे हिंदूओं की आंखों पर के हमेशा के लिए पट्टी उतारने के लिए कितने तरुण, सूर्या, कन्हैया लाल जैसे मासूम और भोले भाले हिंदूओं की आहुति देनी पड़ेगी?
भारत में सभ्यता और धर्म को बचाने के लिए दो तरफा लड़ाई लड़ी जाने की ज़रूरत है. एक तरफ जहां हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करके जनसंख्या को तेज़ी से बदला जा रहा हैं वहीं मारकाट करके हिंदुओं की संख्या कम करने और उनके भीतर ख़ौफ पैदा करने की कोशिश की जा रही है. ओर्गनाइज़र मैगज़ीन के एक डेटा के अनुसार साल 2025 में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने 100 से ज़्यादा हिंदुओं को टारगेट बनाकर मारा है.
भारत में रहने वाले वामपंथियों द्वारा ऐसे लोगों को नैतिक सुरक्षा देना भी इस तरह की हत्याओं का कारण बनता है. हिंदुओं के साथ होने वाले हर अन्याय को वामपंथी एक मज़ाक और ड्रामे के तरह देखते है. एक तरफा समर्थन और हत्यारों के लिए हर संभव कानूनी लड़ाई लड़ने का लेफ्ट और लिबरल लोगों का जुनून न सिर्फ समाज में रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए ख़तरा है बल्कि देश को अंदर तक तोड़ने का उनका और मुस्लिम कट्टरपंथियों का एक आसान तरीका भी है.
