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राजकुमार भाटी को हिंदू धर्म से नफ़रत क्यों

भारत का राजनीतिक परिदृश्य, जो जातिगत समीकरणों और उनके आधार पर बनी चुनावी रणनीतियों के चारों तरफ घूमता रहता है, का राजकुमार भाटी के एक विवादित बयान के बाद भारी उथल-पुथल की स्थिति में आ गया. यह विवाद दिल्ली स्थित राजीव गांधी फाउंडेशन के दफ्तर, जहां कांग्रेस पार्टी से जुड़ी मीटिंग होती रहती हैं, जवाहर भवन में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उनके संबोधन के बाद शुरू हुआ. इस कार्यक्रम में भाटी ने ब्राह्मण समुदाय को निशाना बनाते हुए एक पारंपरिक दोहा पढ़ा था, जो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो गया और राजनीतिक जगत के सभी वर्गों से तत्काल निंदा का पात्र बना.

भाटी, जो पेशे से पूर्व पत्रकार हैं और जिन्होंने मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर तथा विधि (कानून) की डिग्री हासिल की है, पहले दादरी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव भी लड़ चुके हैं. उनकी इन टिप्पणियों के बाद उपजी स्थिति इस बात को रेखांकित करती है कि हाशिए पर पड़े वर्गों को लामबंद करने और आधुनिक लोकतांत्रिक चुनावों में जीत हासिल करने के लिए किस प्रकार से किसी खास जाति के लोगों को निशाना बनाया जाने लगा है, खासकर ब्राह्मण समाज के ख़िलाफ़ सबसे ज्यादा तीखी बयानबाजी सामने आ रही है.

भाटी जवाहर भवन में रफ़ीक़ शकील अंसारी और जावेद अनवर द्वारा लिखित पुस्तक ‘जाति और सांप्रदायिकता के विषाणु’ के विमोचन कार्यक्रम के अवसर पर बोल रहे थे. अपने भाषण के दौरा भाटी ने एक कहावत सुनाई, जिसकी व्याख्या ब्राह्मणों के प्रति अत्यंत अपमानजनक है. उन्होंने ब्राह्मणों को वैश्या से भी बुरा बताया और अपनी बात करहकर हंसने लगे. साथ ही वहां बैठे अन्य लोग भी उनके साथ हंस रहे थे. उनका कहा था: ‘ब्राह्मण भला न वैश्या, इनमें भला न कोय…. और कोई-कोई तो वैश्या भली, ब्राह्मण भला न कोय.’

इस कार्यक्रम के वक्ताओं के नाम सुनकर ही समझ आ जाएगा कि किस तरह का झूठ यहां फैलाया गया है. भाटी का यह बयान दर्शाता है कि किस हद तक राजनेताओं में किसी खास वर्ग के प्रति शत्रुतापूर्ण घृणा बसी हुई है. इससे पहले भी राजीव गांधी फाउंडेशन हिंदुओं के ख़िलाफ़ इस तरह के कार्यक्रम आयोजित कर चुका है जहां खुलकर हिंदुओं और ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ ज़हर उगाया गया है.

यह पहली बार नहीं था जब भाटी ने समाज के एक विशेष वर्ग या हिंदू धर्म के बारे में घटिया बात बोली हो. समाजवादी पार्टी का यह नेता हिंदू धर्म और जाति विशेष को गाली देने के लिए ही जाना जाता है. कुछ ही समय पहला भाटी ने भगवान राम को अवगुणों वाला और मोहम्मद साहब को कईं गुणों वाला आदमी बताया था. जिससे साफ पता चलता है कि भाटी का धार्मिक लगाव किस धर्म के प्रति है. लेकिन हिंदू धर्म में विश्वास नहीं होना समझ में आता है. यदि किसी को किसी धर्म विशेष में भरोसा नहीं है तो कोई बात नहीं ऐसे बहुत से लोग हैं जो धर्म को नहीं मानते, लेकिन बार-बार हिंदू धर्म में फूट डालने के प्रयास करते रहना, देवी-देवताओं को नीचा दिखाना, धर्म से जुड़े ग्रंथों की गलत व्याख्या करने में भाटी को मज़ा क्यों आने लगा है?

सच्चाई यह है कि भाटी समाजवादी पार्टी और भारत विरोधी लोगों के कहने पर दिल और ज़बान, दोनों खोलकर भारत के लोगों को ब्राह्मणों और हिंदू धर्म के प्रति भड़काने का पूरा-पूरा प्रयास कर रहा है. बिना बड़े नेता की सहमति के देश विरोधी, धर्म विरोधी बयान दे ही नहीं सकता. दूसरा राजकुमार भाटी की सोच देश के टुकड़े करने वाले वामपंती गिरोह से भी ऊपरी स्तर वाली है. भाटी वामपंथियों की तरह हर झूठ को पूरे साहस के साथ बोलते हैं. और बोलने के बाद पिटने के डर से कुछ समय के लिए गायब हो जाते हैं. समाजवादी पार्टी का भाटी को संरक्षण किसी भी तरह छिपा नहीं है. जाति विशेष के ख़िलाफ़ बोलने पर सपा ने उनपर कोई एक्शन नहीं लिया. राज्यसभा में महाराणा सांगा के विरुद्ध ज़हरीला बयान देने पर भी रामजीलाल सुमन के सर पर पार्टी का हाथ बना रहा था. इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत विरोध और हिंदू धर्म का विरोध करने में सपा हमेशा से ही सबसे आगे रही है.    

‘रामायण और मनुस्मृति को कूड़े में फेंक देना चाहिए’, ‘मैं पैगंबर मोहम्मद साहब से बड़ा महापुरूष किसी को नहीं मानता, राम को भी नहीं, क्योंकि उन्होंने समाज सुधार का कोई संदेश नहीं दिया.’ ‘इन जगतगुरुओं ने कौन से अविष्कार किए, अगर नहीं किए तो फिर किस बात के जगतगुरू.’ यह बयान राजकुमार भाटी के हैं. भाटी ब्राह्मणों तक ही नहीं रुके जाट और गुजरों को लेकर भी उन्होंने बड़ा विवादित बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘राजा-महाराजाओं में एक पति को एक से ज़्यादा पत्नियां रखने का रिवाज़ था. लेकिन जाट और गुजरों में एक पत्नी एक से ज़्यादा पति रखती थी.’ समाज की विभिन्न जातियों को आपस में भिड़ाने की भाटी की मनोकामना फिलहाल पूरी होती नज़र नहीं आ रही है. यहां तक की जाट-गुजरों पर दिए घटिया बयान के बाद भी भाटी के ख़िलाफ़ कोई बड़ा विरोध होता नहीं देखा गया. हो सकता है लोगों ने उनकी मानसिक बीमारी को पहचान लिया हो.

लेकिन हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने वाले अकेले भाटी नहीं है. सपा, डीएमके, राजद और अन्य मुस्लिम दलों के कई नेता भी उन्हीं के साथ धर्म के ख़िलाफ़ झूठ फैलाने और ब्राह्मणों को विलेन बनाने के काम में लगे रहते हैं. भाटी के भीतर हिंदुओं को लेकर घृणा का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक पोडकास्ट के दौरान मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर बात करते समय उन्होंने यहां तक कहा कि उन दंगों में ‘सचिन और सौरभ इसलिए नहीं मारे गए कि मुसलमानों की भीड़ ने उन्हें मारा था, बल्कि उनका दिन ही ख़राब था.’  

हमें समझना होगा कि बीते कई सालों से ब्राह्मणों को इतने बड़े स्तर पर विरोध का सामना क्यों करना पड़ रहा है. आखिर क्यों सभी विपक्षी दल सिर्फ ब्राह्मणों को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं. भारत के धार्मिक स्वरूप, संस्कृति की बागड़ोर अधिकतर ब्राह्मणों के होथों में ही रही हैं. ब्राह्मण पर सीधे तौर पर निशाना साधते हुए बाहरी और क्रूर बताना एक बड़ी साजिश का हिस्सा है. जिससे हिंदू धर्म की जड़ें कमज़ोर हो सके, हिंदू विभाजित हो सके और फिर झूठे सेक्यूलेरिज़्म के नाम पर विपक्षी दलों को वोट दे सकें. लेकिन आज से नहीं चल रहा मुगलों और अंग्रेजों के ज़माने से ब्राह्मण हमेशा धर्म विरोधी लोगों को खटकते रहें हैं. वर्तमान समय में भी यही हो रहा है. 

पिछली दो शताब्दियों में जाति से जुड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलावों ने भारतीय समाज की पारंपरिक संरचना को काफी हद तक बदल दिया है. ब्राह्मण-विरोधी राजनीतिक आंदोलनों, औपनिवेशिक नीतियों और बाद में जाति-आधारित चुनावी राजनीति ने पुरानी सामाजिक संस्थाओं को कमज़ोर किया और सामाजिक विखंडन में योगदान दिया. ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणों ने हिंदू सभ्यता के भीतर शिक्षा, दर्शन, धार्मिक ज्ञान, संस्कृत विद्या और बौद्धिक परंपराओं के संरक्षक के रूप में कार्य किया. ब्राह्मण संस्थाओं पर हमले केवल जातिगत पदानुक्रम का विरोध नहीं है, बल्कि एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसने भारत में सांस्कृतिक निरंतरता और सभ्यतागत आत्मविश्वास को कमज़ोर किया है.

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान, औपनिवेशिक प्रशासन ने जनगणना वर्गीकरण, कानूनी वर्गीकरण और सामाजिक विभाजन की ऐसी प्रणालियां विकसित कीं, जिन्होंने भारतीय समुदायों के अपनी पहचान को समझने के तरीके को बदल दिया. ब्रिटिश प्रशासकों ने जातिगत विभाजनों पर ज़ोर देकर और लचीली सामाजिक पहचानों को कठोर राजनीतिक श्रेणियों में बदलकर “फूट डालो और राज करो” की रणनीति अपनाई. औपनिवेशिक अधिकारियों ने समुदायों को निश्चित पदानुक्रमों और प्रशासनिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया, जिससे सामाजिक विभाजनों को और गहरा किया और जाति समूहों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पैदा की. उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के दौरान भारत के कुछ हिस्सों में विकसित हुआ ब्राह्मण-विरोध आज तक प्रभावी है. जाति व्यवस्था का विरोध करने वाले संगठन और नेता अब सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर, समग्र रूप से ब्राह्मण समुदायों के प्रति शत्रुता के क्षेत्र में प्रवेश कर गए.

पिछली शताब्दी में तत्कालीन नेताओं ने अनजाने में कुछ ऐसे विभाजनकारी, पश्चिमी सिद्धांतों का सहारा लिया, जो कि अब पूर्णतः खारिज हो चुका है. ‘आर्यन आक्रमण का सिद्धांत’, जिसने हिंदू समाज की आंतरिक समरसता को आघात पहुंचाया. यद्यपि सामाजिक सुधार, विधिक कल्याण और अस्पृश्यता उन्मूलन की दिशा में उनके योगदान को संपूर्ण आदर के साथ स्वीकार किया जाता है, लेकिन उनके कुछ अतिवादी कदमों, जैसे पूज्य ग्रंथों का दहन और सामूहिक धर्मांतरण – को इतिहास का एक ऐसा अनावश्यक टकराव माना जाता है, जिसने भारत की स्वाभाविक आध्यात्मिक चेतना को शिथिल किया.

आज का विमर्श सामाजिक समरसता पर केंद्रित है, जो जातियों के मध्य कटुता उत्पन्न किए बिना, प्राचीन धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक समता सुनिश्चित करने का पक्षधर है. भारतीय इतिहास में तथाकथित “ब्राह्मण-विरोध” की विधा को राष्ट्रवादी चिंतक सामाजिक न्याय का स्वाभाविक क्रमिक विकास नहीं, बल्कि औपनिवेशिक काल की एक प्रायोजित और विभाजनकारी रणनीति के रूप में देखते हैं. इस वैचारिक मतभेद के बीज उन्नीसवीं शताब्दी में तब बोए गए, जब ब्रिटिश प्रशासकों और मिशनरियों ने सुनियोजित तरीके से ‘आर्यन आक्रमण सिद्धांत’ को प्रतिपादित किया. इस काल्पनिक विमर्श का मूल उद्देश्य भारतीय समाज को विघटित करना था, जिसमें ब्राह्मणों को ‘विदेशी आक्रांता’ और वंचित वर्गों को ‘मूल निवासी पीड़ित’ के रूप में चित्रित किया गया.

इस पश्चिमी दृष्टिकोण को अपनाने से देश में पहचान की राजनीति की नींव पड़ी, जिसने हिंदू समाज की सभ्यतागत एकात्मता को प्रभावित किया. केवल तात्कालिक कुरीतियों को केंद्र में रखने के कारण, इन आंदोलनों ने उस सनातन आध्यात्मिक सूत्र की उपेक्षा कर दी, जिसने युगों-युगों से संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरो रखा था.

बीसवीं शताब्दी में यह सामाजिक आलोचना, वैचारिक धरातल से उतरकर चुनावी लाभ और राजनीतिक लामबंदी का साधन बन गई. दक्षिण भारत में पेरियार के नेतृत्व वाले द्रविड़ आंदोलन ने उग्र ब्राह्मण-विरोधी स्वरूप धारण कर लिया. इसके परिणामस्वरूप एक ऐसे अल्पसंख्यक समुदाय को सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया गया, जिसके पास धार्मिक-सांस्कृतिक विशिष्टता के अतिरिक्त कोई सुदृढ़ आर्थिक या संख्यात्मक बल नहीं था.

डॉ. अंबेडकर की विरासत का दावा करने वाले परवर्ती राजनीतिक दलों ने वोट-बैंक की राजनीति के लिए जातिगत द्वेष को बढ़ावा दिया, जिससे सामाजिक दूरियां घटने के बजाय और अधिक गहरी होती गईं. वर्तमान इक्कीसवीं शताब्दी का विमर्श पूर्णतः सामाजिक समरसता की ओर उन्मुख है. आधुनिक राष्ट्रवादी चिंतन का मानना है कि राष्ट्र की वास्तविक प्रगति और अभ्युदय, आंतरिक सुधारों और एक सुदृढ़ सांस्कृतिक पहचान में अंतर्निहित है. ऐतिहासिक कटुताओं को जीवित रखने या किसी विशिष्ट समुदाय को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने के स्थान पर, आज का समकालीन दृष्टिकोण भारत की साझी आध्यात्मिक विरासत में प्रत्येक वर्ग और जाति के अमूल्य योगदान का गौरव गान करता है. यह परस्पर सम्मान, समता और राष्ट्रीय अस्मिता पर आधारित एक एकात्म भविष्य के निर्माण का आह्वान है.

भारतीय राजनीति और शिक्षा जगत के कुछ हिस्सों ने सभी सामाजिक समस्याओं को “ब्राह्मणवाद” और जातिगत विशेषाधिकार के नज़रिए से देखकर, ब्राह्मणों के प्रति शत्रुता को सामान्य बना दिया है. 2022 में जेएनयू में देखे गए ब्राह्मण-विरोधी भित्तिचित्रों और नारों जैसी घटनाएं इसका प्रत्यक्ष उदहारण हैं, जहां दीवारों पर “ब्राह्मण कैंपस छोड़ो” और ब्राह्मण तथा बनिया समुदायों को निशाना बनाने वाले संदेश लिखे थे. दिल्ली विश्वविद्यालय में कई बार ब्राह्मण अध्यापकों के साथ मारपीट की घटना भी सामने आई हैं जिसमें उन्हें तथाकथित तौर पर जातिवादी बता दिया जाता है. हम देखते हैं की हाल में हुई लगभग सभी घटनाओं में एक खास राजनितिक समूह हाथ में डफली लिए “ब्राह्मणवाद से आज़ादी” का नारा लगते हुई दिखता है. यही फिर सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनमानस तक पहुंचता है जो समाज में ब्राह्मण वर्ग के ख़िलाफ़ घृणापूर्ण नज़रिया बनता है. क्षेत्रीय पार्टियों और विपक्षी राजनीति के कुछ हिस्सों द्वारा जाति-आधारित राजनीतिक लामबंदी ने ऐसा माहौल बना दिया है, जहां अन्य सामाजिक समूहों पर होने वाले हमलों की तुलना में ब्राह्मण-विरोधी बयानबाज़ी की आलोचना कम होती है. वे अक्सर दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में मौजूद ऐतिहासिक ब्राह्मण-विरोधी राजनीतिक परंपराओं और समकालीन पहचान की राजनीति को इसके लिए ज़िम्मेदार कारक बताते हैं. चुनावी राजनीति तेज़ी से जातिगत गठबंधनों पर निर्भर होती जा रही है, जिससे सामाजिक सद्भाव के बजाय ध्रुवीकरण और असंतोष पैदा हो रहा है.

राजकुमार भाटी की आए दिन हिंदू धर्म पर की गई टिप्पणी को लेकर खड़ा होने वाला विवाद महज़ ज़बान फिसलने का मामला कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. दशकों से जो पार्टियां बस किसी खास वर्ग की हितैषी बनकर काम करती रही है अब भारत के बदलते राजनीतिक परिदृश्य और सत्ता से दूर होने के बाद बौखलाहट में है. और अपने बयानों से समाज में फुट डालकर पुनः सत्ता हथियाने की फिराक़ में है. यह उन पार्टियों के सामने खड़ी बुनियादी चुनौती को उजागर करता है, जो ब्राह्मण-विरोध के पुराने और टकराव भरे पैमानों के ज़रिए अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश करती हैं. जहां ये पार्टियां वोट-बैंक जुटाने के लिए ऐतिहासिक शिकायतों पर निर्भर रहती हैं, वहीं उन्हें अब ऐसे बदलते हुए मतदाताओं का सामना करना पड़ रहा है, जो मनगढ़ंत सामाजिक टकराव के बजाय विकास और सांस्कृतिक एकता को ज़्यादा अहमियत देते हैं.

अनिमेश कुमार मिश्रा
अनिमेश कुमार मिश्रा
अनिमेष कुमार मिश्रा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हैं.