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विरासत की ओर

दशकों तक मुस्लिमों ने छिपाई भोजशाला मंदिर की सच्चाई

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अपने फैसले में धार भोजशाला को हिंदू मंदिर बताया है. 15 मई, 2026 को कोर्ट ने 98 दिनों तक चले एएसआई के सर्वे के आधार पर अपना फैसला सुनाया. कोर्ट ने यह बात मानी कि दास्तावेज़ शिलालेख, मूर्तियां, स्तंभ यह संकेत देते हैं कि वहां मस्जिद से पहले प्राचीन हिंदू मंदिर था. इसके अतिरिक्त न्यायालय ने केंद्र सरकार को यह सुझाव भी दिया कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी गई मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत वापस लाने की दिशा में सार्थक प्रयास किए जाएं. कोर्ट ने माना कि भोजशाला देवी वाग्देवी की अराधना और संस्कृति का केंद्र था. इस फैसले के बाद जहां हिंदुओं में अपनी सभ्यता, धर्मिक विरासत की वापसी से खुशी की लहर साफ़ दिखाई दी, वहीं भोजशाला को मस्जिद समझने वाला मुस्लिम पक्ष फिर से संविधान, धर्मनिपरेक्षता की दुहाई देकर भारत के मूल धर्म के प्रति झूठ फैलाता हुआ नज़र आया. यह सच्चाई अब सभी के सामने आ चुकी है कि किस तरह भारत में हिंदू मंदिरों को मस्जिद बनाकर इनकी पहचान को धुमिल करने का प्रयास कितने बड़े स्तर पर किया जा रहा है.

भोजशाला का इतिहास भारतीय मध्यकालीन और प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं के जटिल विकास से जुड़ा माना जाता है. ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार इसका संबंध मुख्यतः 11वीं शताब्दी (लगभग 1000–1055 ई.) में परमार वंश के शासक राजा भोज के काल से जोड़ा जाता है. इस भोजशाला का नाम राजा भोज के नाम पर पड़ा है, जो मां सरस्वती के भक्त थे. एतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार साल 1034 में राजा भोज ने नालंदी और तक्षिला जैसे महाविद्यालयों की स्थापना की थी. 

भोजशाला का इतिहास केवल एक भवन के निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक, शैक्षिक और राजनीतिक यात्रा का भी साक्षी माना जाता है. राजा बोज के समय मालवा क्षेत्र ज्ञान, कला, साहित्य और दर्शन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हुआ था. कई ऐतिहासिक व्याख्याओं में इसे उस समय की एक उच्च स्तरीय शैक्षिक संस्था के रूप में वर्णित किया जाता है, जहां संस्कृत अध्ययन, व्याकरण, ज्योतिष, दर्शन और अन्य शास्त्रों का गहन अध्ययन कराया जाता था. इस परंपरा के कारण इसे एक “विद्या केंद्र” या “शास्त्र अध्ययन संस्थान” के रूप में भी देखा जाता है.

13वीं शताब्दीके बीच उत्तरी भारत में मुगलों के कारण मची उतल-पुथल का असर विद्या के इन केंद्रों पर भी पड़ा. 1305 में बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय पर हमला करने के बाद भोजशाला को निशाना बनाया. और उसे ध्वस्त कर दिया. साल 1401 में दिलावर खान गौरी ने भोजशाला में एक मस्जिद का निर्माण करवाया. साल 1514 में महमूद शाह खिलजी ने यहां एक और मस्जिद बनवाई जिसे लाट मस्जिद कहा जाता है. 

भोजशाला की बहस केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है; यह इतिहास, स्मृति, विरासत और पहचान के बड़े विमर्श का हिस्सा है. शायद इसी कारण यह मुद्दा समय के साथ समाप्त होने के बजाय और अधिक गहराई से चर्चा में आता रहा. भोजशाला परिसर के एक हिस्से को मुस्लिम समुदाय लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद बताकर वहां नमाज़ पढ़ता आया है. मुस्लिम पक्ष का मानना है कि शुरुआत से ही यहां मस्जिद ही रही है न कि कोई मंदिर.

मुस्लिम पक्ष का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक स्थल का मूल्यांकन केवल एक समय-खंड या एक पक्ष के दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता, बल्कि उसके दीर्घकालीन उपयोग, परंपरा और सामाजिक स्वीकार्यता को भी महत्व देना चाहिए. इसी आधार पर वे कमाल मौला मस्जिद को एक मस्जिद और धार्मिक विरासत का हिस्सा मानते हैं. लेकिन भारत के मूल धर्म के प्रति नफ़रत रखकर जबरन मंदिरों पर कब्ज़े की बात मुस्लिम पक्ष हमेशा की तरह स्वीकार नहीं पाया. 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि भोजशाला मामले ने तूल पकड़ा हो. बीते लंबे समय से हिंदू पक्ष अपनी विरासत वापस पाने के लिए कठोर संघर्ष कर रहा है. ब्रिटिश शासन के दौरान भी भोजशाला की ऐतिहासिक महत्ता पर ध्यान दिया गया था. साल 1902–03 के दौरान धार रियासत के शिक्षा अधीक्षक के.के. लेले ने परिसर का अध्ययन किया. इस अध्ययन में दीवारों और स्तंभों पर संस्कृत शिलालेख मिले. 123 साल पुरानी एक रिपेर्ट के अनुसार जब अंग्रेजों ने भोजशाला के सर्वे के लिए खुदाई कराई तो वहां मां सरस्वती की प्रतिमा मिली थी. जिसे वे अपने साथ लंदन ले गए थे. आज भी वह लंदन में ही है. इसी रिपोर्ट के अनुसार जिस कमरे में मुसलमान नमाज़ पढ़ते थे वहां संस्कृत वर्णमाला और हिंदू प्रतीक पाए गए थे. 

इसी काल में सफेद संगमरमर की चार भुजाओं वाली देवी वाग्देवी की एक ऐतिहासिक प्रतिमा को ब्रिटेन ले जाया गया और जो वर्तमान में यह लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है. 1909 में परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया और बाद में इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक का दर्जा मिला.

वर्ष 2003 में एएसआई द्वारा एक प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई, जिसके तहत हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार पूजा की अनुमति दी गई, जबकि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार के दिन नमाज़ की अनुमति दी गई. उस समय इसे तनाव कम करने और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से एक व्यावहारिक समाधान माना गया.

लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था दोनों पक्षों के बीच असंतोष का कारण बनने लगी. हिंदुओं का तर्क था कि यदि किसी स्थल की हिंदू पहचान और धार्मिक स्वरूप सभी के सामने मौजूद हैं, तो केवल समय-आधारित बंटवारा स्थायी समाधान नहीं हो सकता. दूसरी ओर यह भी कहा गया कि ऐसी व्यवस्थाएं मूल विवाद को हल करने के बजाय केवल उसे कुछ समय के लिए स्थगित करती हैं.

पिछले वर्षों में विवाद ने नई दिशा तब ली जब वैज्ञानिक सर्वेक्षण, ऐतिहासिक अभिलेखों और संरचनात्मक विश्लेषणों पर अधिक जोर दिया जाने लगा. इसके बाद न्यायालय में लगातार सुनवाई हुई और 15 मई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को देवी वाग्देवी/सरस्वती मंदिर के रूप में मानते हुए 2003 की एएसआई व्यवस्था को निरस्त कर दिया. रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने यह भी माना कि केवल उपयोग की निरंतरता से किसी स्थल की मूल पहचान तय नहीं हो सकती.

आज यह प्रश्न केवल भोजशाला तक सीमित नहीं है. यह बहस अब उस बड़े मुद्दे की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है कि क्या भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों की पहचान का निर्धारण केवल वर्तमान उपयोग से होगा, या फिर इतिहास, पुरातात्विक साक्ष्यों और न्यायिक परीक्षणों की सच्चाई के आधार पर सुनवाई होनी चाहिए. सीता राम गोयल की किताब ‘हिंदू टैंपल्स एंड वाह्ट हैपंड टू दैम’ के अनुसार भारत में 1800 मस्जिदों और अन्य इस्लामिक ढ़ाचों को मंदिर तोड़कर बनाया गया है. यह सच्चाई भारत में मुस्लिमों और वामपंथी सोच के लोगों को सौहार्द के लिए एक बड़ा खतरा दिखाई पड़ती है. अयोध्या का मामला हो, ज्ञानवापी हो या भोजशाला, वामपंथी बुद्दिजीवियों ने कभी भी इस देश में मुस्लिमों को सच का आइना नहीं देखने दिया और अपने बहकावे में हमेशा फंसाए रखा.    

भोजशाला विवाद से जुड़े न्यायिक संघर्ष की शुरुआत वर्ष 2013 में मानी जाती है, जब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में इस विषय को लेकर पहली महत्वपूर्ण याचिका दायर की गई. इसके बाद समय-समय पर इस मामले से संबंधित अन्य याचिकाएं भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गईं, जिससे यह मुद्दा एक नियमित धार्मिक विवाद से आगे बढ़कर एक गहन ऐतिहासिक और संवैधानिक बहस का रूप लेने लगा.

न्यायिक प्रक्रिया के दौरान 6 अप्रैलको इस मामले में नियमित सुनवाई की शुरुआत हुई, जिसके बाद 12 मई तक लगातार सुनवाई और पक्षों की दलीलें दर्ज की जाती रहीं. अंततः 15 मईको इस प्रकरण में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया गया, जिसे इस विवाद की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक चरण माना गया.

सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने तर्क प्रस्तुत किया कि 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा लागू की गई व्यवस्था को समाप्त किया जाए और परिसर में पूजा का पूर्ण एवं स्वतंत्र अधिकार सुनिश्चित किया जाए, क्योंकि उनके अनुसार यह स्थल ऐतिहासिक रूप से हिंदू परंपरा और पूजा-पद्धति से जुड़ा रहा है. दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष ने इस परिसर को मस्जिद के रूप में मान्यता देने और अपने धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग की. जैसा कि यह पक्ष अयोध्या, मथूरा, काशी के मामले में करता आया है.

अपने 242 पन्नों का ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, पुरातात्विक साक्ष्यों, वैज्ञानिक सर्वेक्षणों और न्यायिक सिद्धांतों को व्यापक रूप से आधार बनाया. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी स्थल के वास्तविक स्वरूप को निर्धारित करने के लिए केवल वर्तमान उपयोग पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके ऐतिहासिक विकास और उपलब्ध साक्ष्यों की निरंतरता को भी समझाना आवश्यक है.

अपने फैसले में अदालत ने सबसे पहले इस बात को स्वीकार किया कि उपलब्ध साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि धार की भोजशाला मूल रूप से मां सरस्वती यानी वाग्देवी से संबंधित एक मंदिर तथा संस्कृत शिक्षा केंद्र थी. न्यायालय ने कहा कि एएसआई द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण, परिसर में मिले संस्कृत शिलालेख, देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां और संरचनात्मक अध्ययन इस बात की ओर संकेत करते हैं कि वर्तमान ढांचे से पहले यहां एक प्राचीन परमारकालीन संरचना मौजूद थी.

अदालत ने यह भी माना कि इस स्थल पर हिंदुओं की पूजा परंपरा समय के साथ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी. वर्षों के दौरान पूजा के स्वरूप और पहुंच में परिवर्तन अवश्य हुए, लेकिन धार्मिक निरंतरता पूरी तरह टूट नहीं गई. इसी आधार पर न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि हिंदू पक्ष के धार्मिक दावे को केवल इस कारण समाप्त नहीं माना जा सकता कि समय के किसी चरण में परिसर का उपयोग किसी अन्य स्वरूप में भी किया गया.

इसके बाद अदालत ने वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा जारी उस आदेश की समीक्षा की, जिसके अनुसार हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी गई थी. अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था तत्कालीन प्रशासनिक परिस्थितियों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से बनाई गई थी, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं थी. न्यायालय ने माना कि यदि वैज्ञानिक और ऐतिहासिक साक्ष्य किसी अन्य वास्तविकता की ओर संकेत कर रहे हैं, तो केवल प्रशासनिक व्यवस्था को अंतिम आधार नहीं माना जा सकता. इसी कारण अदालत ने वर्ष 2003 के एएसआई आदेश को निरस्त कर दिया.

फैसले में एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह था कि अदालत ने मुस्लिम पक्ष के उन तर्कों पर भी विचार किया जिनमें पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का उल्लेख किया गया था. इस संदर्भ में अदालत ने कहा कि एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारकों की स्थिति सामान्य धार्मिक स्थलों से भिन्न होती है. इसलिए इस मामले में अधिनियम की व्याख्या को अलग संदर्भ में देखा जाना आवश्यक है.

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि केवल किसी स्थल के उपयोग के आधार पर ऐतिहासिक साक्ष्यों को समाप्त नहीं किया जा सकता. बल्कि ऐतिहासिक निरंतरता, पुरातात्विक साक्ष्य और दस्तावेजी प्रमाणों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए. न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि इतिहास से जुड़े विवादों का समाधान केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यात्मक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए.

अपने अंतिम निर्देशों में अदालत ने यह भी कहा कि भोजशाला परिसर का प्रशासन और प्रबंधन पहले की तरह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास ही रहेगा, ताकि स्मारक की ऐतिहासिक संरचना और पुरातात्विक महत्व सुरक्षित रह सके. इस प्रकार हाई कोर्ट का यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं रहा, बल्कि इतिहास, पुरातत्व, धार्मिक अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान के कई पहलुओं को एक साथ जोड़ने वाला निर्णय बन गया. यही कारण है कि इस फैसले को केवल भोजशाला विवाद तक सीमित नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में भी देखा जा रहा है.

अदालत ने अपने निर्णय में अयोध्या मामले में स्थापित कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि किसी स्थल पर लंबे समय तक किसी एक समुदाय द्वारा उपयोग किए जाने मात्र से दूसरे पक्ष के ऐतिहासिक दावे स्वतः समाप्त नहीं हो जाते. न्यायालय ने कहा कि ऐतिहासिक निरंतरता, दस्तावेज़ी प्रमाण, पुरातात्विक साक्ष्य और स्थल की वास्तविक ऐतिहासिक पहचान को भी महत्व देना आवश्यक है.

यही वह बिंदु है जहां भोजशाला विवाद एक सामान्य धार्मिक विवाद से आगे बढ़कर भारत के ऐतिहासिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है. कई लोग यह तर्क रखते हैं कि यदि किसी स्थान से जुड़े अभिलेख, स्थापत्य विशेषताएं, पुरातात्विक संकेत या ऐतिहासिक दस्तावेज़ उपलब्ध हों, तो उन्हें केवल इसलिए अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि समय के साथ उस स्थान का उपयोग बदल गया.

अदालत ने यह भी कहा कि संरक्षित पुरातात्विक स्थलों को सामान्य धार्मिक विवादों की तरह नहीं देखा जा सकता. ऐसे स्थलों का प्रश्न केवल आस्था तक सीमित नहीं होता; वह सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक पहचान और सभ्यतागत स्मृति से भी जुड़ा होता है.

इसलिए भोजशाला विवाद केवल एक इमारत का विवाद नहीं, बल्कि उस बड़े प्रश्न का हिस्सा है – इतिहास के वे अध्याय, जिन पर दशकों से बहस चल रही है, उनका अंतिम उत्तर किस आधार पर तय होगा: समय, परंपरा, आस्था या साक्ष्य?

वागदेवी की मूर्ति

हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही है. इसलिए कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि सर्वोच्च न्यायालय हाई कोर्ट के इस फैसले को पलट सकता है. ओवैसी ने बाबरी मस्जिद और इस मामले के बीच समानताएं भी बताईं. शायद वह भारत के इतिहास को पूरी तरह से अभी तक भी समझ नहीं पाए हैं. वोट बैंक की ख़ातिर हिंदू विरासत को मुस्लिम ढ़ांचा बताने की आदत उन्हें कभी भी इस देश के प्रति वफ़ादार साबित नहीं होने देगी. 

इसी प्रकार कई मुस्लिम संगठनों ने भी इस फैसले के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कही है. इसी बीच दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में वंदे मातरम का विरोध करने वाले मैहमूद मदनी ने बाबरी मस्जिद के दौर की बात करते हुए मुसलमानों से कहा कि यह इस मामले को समाप्त होने दिया जाए. उनके अनुसार, समुदाय ने संविधान पर भरोसा किया लेकिन विवाद वहीं नहीं रुके. उन्होंने तंजिया अंदाज में यह भी कहा कि यदि बदलाव करना ही है तो प्लेसिस ऑफ वारशिप एक्ट, 1991 को सीधे समाप्त कर देना चाहिए, घुमा-फिराकर करने की आवश्यकता नहीं है.

वरिष्ठ पुरातत्वविद् के. के. मुहम्मद शुरुआत से ही अपने सर्वेक्षण के आधार पर धार की भोजशाला को ऐतिहासिक रूप से एक मंदिर ही बताते आए हैं. उनका यह बयान फैसले के बाद चल रही बहसों में मुस्लिम पक्ष को खासा परेशान कर देता है. इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर मुस्लिमों द्वारा चलाए जाने कुछ हैंडल्स से धमकी भरे, झूठी जानकारी वाले भड़काऊ पोस्ट भी देखे गए. जो सीधे तौर पर झूठ के आधाक पर देश में दंगे कराने की फिराक में थे.  

यह फैसला भारत की हिंदू विरासत को वापस पाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. दशकों से अपने ही धार्मिक स्थल वापस पाने के लिए संघर्ष करने वाले हिंदू, मुस्लिम कट्टपंथियों की धमकियों से बेफिक्र नज़र आ रहे है. शायद उन्हें अपनी खोई हुई क्षमता का एहसास हो गया है. हिंदुओं को हिंदुओं के ही देश में न्याय दिलाने की दिशा में आया यह फैसला यहां के लोगों की उम्मीदों को बल देगा, जिससे वे अपनी विरासत पर शर्मिंदा होने की बजाए उसे हासिल करने पर विचार करेंगे.