शायद ही देश का ऐसा कोई कोना हो जहां हिंदुओं पर अत्याचार, हिंसा, प्रताड़ित करने, धर्मांतरण की और हज़ारों साल पुराने मंदिरों को तोड़ने की खबरें न आती हों. वर्तमान समय में मुस्लिमों की एकजुटता के उलट देश में ऐसा कोई संगठन दिखाई नहीं पड़ता जो बड़े स्तर पर हिंदुओं की समस्याओं को समझकर मदद की पेशकश करता हो. ऐसे में दिल्ली के रहने वाले राहुल दीवान ने यह काम अपने कंधो पर लिया है. सोफ्टवेयर इंजीनियर की लाखों रूपए की नौकरी छोड़कर राहुल ने दिन-रात हिंदुओं के हितों के लिए काम करने का रस्ता चुना. राहुल ने 2023 में हिंदु फंड बनाने की ठानी, जिसमें 1000 करोड़ रूपए जुटाने का लक्ष्य रखा है. राहुल ने बताया कि वे देश के किसी भी कोने में हो रहे गलत तरह से धर्मांतरण को रोकने, मंदिरों को तोड़ने से रोकने और हिंदू हितों के लिए इस फंड का उपयोग करेंगे. राहुल ने दि डोज़ियर से विस्तार से इस बारे में बात की.
ईशा – आप मूल रूप से कहां से हैं. सोफ्टवेयर इंजीनियर से हिंदु फंड तक का सफर कैसा था?
राहुल दीवान – हम पंजाबी खतरी हैं. मेरे दादा-दादी, नाना नानी सभी बंटवारे के समय पाकिस्तान के सरगोदा से भारत आए थे. मेरा जन्म दिल्ली में ही हुआ है. मैंने दिल्ली में ही स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई की है. साल 1997 में थोड़े समय के लिए मैंने अमेरिकन कंपनी में नौकरी की फिर एक डेनिश कंपनी के लिए काम किया. 2001 में अपना बिजनेस शुरू किया. मेरे पिता मुझे हमारे इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट ट्रेडिंग के बिजनेस में डालना चाह रहे थे. बहुत समय तक मैंने दुकान पर जाकर काम भी किया.
एक दिन मैंने पापा से कहा कि मुझसे नहीं होगा. और फिर से अपना बिज़नेस शुरू किया. वह मेरे लिए स्ट्रगल का समय था. साल 2022 में मैंने अपनी कंपनी ‘सृजन टेक्नोलॉजीज’ बेच दी. उस समय कंपना में लगभग 600 लोग काम करते थे. और अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर में भी इसके दफ्तर थे. इसके बाद मेंने एक फाउंडेशन बनाई जिसका नाम भी सृजन फाउंडेशन रखा.
ईशा – आपका ध्यान कब हिंदु हितों की तरफ गया. इतना बड़ा फंड बनाने का ख्याल कैसे आया?
राहुल दीवान – बचपन से ही मेरा समाज सेवा की तरफ झुकाव था. देश की सेवा करने की इच्छा थी. साल 1999 में मेरे घर में काम करने वाले एक लड़के के लिए मैंने एक छोटा स्कूल शुरू किया, जहां धीरे-धीरे कार क्लीनर, आस-पास के घरों में काम करने वाले लोगों के बच्चे भी आने लगे. कॉलोनी के ही रिटायर्ड कर्नल साहब, कर्नल रामकृष्णा और एक स्कूल की प्रिंसिपल ने बच्चों को मुफ्त पढ़ाना शुरू किया. घर के पास फादर विंडी रहा करते थे. वे क्रिश्चियन थे, लेकिन मिशनरी नहीं थे. उनके घर में हमने पढ़ाना शुरू किया. बाद जब बच्चों की संख्या अधिक हो गई तब वसंतकुंज के पास किशनगढ़ गांव में एक जगह पर ‘स्कूल ऑफ हैप्पीनेस’ शुरू किया.
हमारे पास फुरकान नाम का एक बच्चा आता था, जो अभी हमारी वीडियो टीम का एडिटर है. वो जब सेकंड या फोर्थ क्लास में था उसने भगवान कृष्णा की एक पेंटिंग बनाई थी. उसके माता-पिता ने उससे कहा कि ये कुफ्र है. वे उसे पेंटिंग नहीं बनाने देते थे. हमने उसकी कला को बढ़ावा दिया. ऐसे ही एक अन्य मुस्लिम लड़का अच्छा म्यूजिशियन था. उसकी हमने बहुत मदद की.
संगम टॉक्स शुरू करने के बाद से मेरे बहुत सारे वामपंती दोस्तों ने मुझसे बात करना बंद कर दिया. 2013-14 में मैंने संजीव सानियाल की एक किताब पढ़ी थी. ‘इंडियाज़ राइज़ आफ्टर अ थाउज़ेंड इयर्स ऑफ डिक्लाइन.’ उसके बाद ‘लैंड ऑफ सेवन रिवर्स’ भी पढ़ी थी.
उस किताब ने गांधीयन इकॉनमिक्स को धराशाही कर दिया. फिर इतिहास वाली किताब आई तो पता चला कि ये तो हमें कभी बताया ही नहीं गया. उस समय मुझे समझ आया कि हमसे कितना कुछ छिपाया गया है.
ईशा – लोगों से आपको कैसा और कितना सपोर्ट मिला? कितने लोगों ने आपके इस विचार का विरोध किया?
राहुल दीवान – 2013-14 में जब भारत में सत्ता बदल रही थी. उस समय सोशल मीडिया पर मैं बहुत एक्टिव रहता था. सोशल मीडिया पर मैंने भारत और हिंदुओं का पक्ष रखना शुरू किया तो मेरे ही दोस्तों और जानकारों नें मुझ पर हिंदूवादी, संघी और एंटी मुस्लिम होने का टैग लगा दिया.
लेकिन मेरा मानना है कि भारत की सिविलाइजेशन कई ज्यादा मायने रखती है. मैंने उसी के लिए काम करने का ठाना. मैंने घर के पास एक छतरपुर के एक आश्रम में योग, ध्यान और साधना की. बहुत सालों तक मैं वहां गया. मैंने अपना ध्यान आध्यात्म की तरफ लगाया. 2008 से लाकर आज की तारीख तक मैं सदगुरू से जुड़ा हूं. कौन लोग विरोध कर रहें हैं इससे अब फर्क नहीं पड़ता.
एस शिवा – आप अभी तक के अपने काम से संतुष्ट हैं? आपका आखिरी उद्देश्य क्या है?
राहुल दीवान – संवैधानिक हिंदू राज्य मेरा आखिरी गोल है. मैं राष्ट्र नहीं बोल रहा हूं, हम हिंदू राष्ट्र तो पहले से ही हैं, कॉन्स्टिट्यूशन में भी हमें यह काम करना है. यह संविधान हिंदू मूल्यों पर नहीं बना है, यह भारतीय वैल्यू को आगे नहीं बढ़ाता. यह सब धर्मों को एक ही तराजू में तोलता है, सभी धर्मों को एक जैसा समझता है जबकि भारत का एक मूल धर्म है जिसे सनातन कहते हैं.
एस शिवा – इस काम को पूरा करने में सबसे बड़ी दिक्कत आपको क्या लग रही है?
राहुल दीवान – हमारे सामने कई सारी समस्याएं हैं. सबसे पहला संविधान और फिर देश की हिंदू लीडरशीप. मैं पूरे हिंदू समाज की बात नहीं कर रहा. हिंदू हितों के लिए काम करने वाले नेताओं की बात कर रहा हूं. आप इन सभी से पूछिएगा कि अंतिम लक्ष्य क्या है तो सभी हिंदू एकता की बात कहेंगे. लेकिन यहां हिंदू यूनिटी संभव नहीं है. सभी जातियों में बंटे हिंदुओं की बात करेंगे. अगर मैं अपने नाम के आगे दीवान नहीं लिखूं तो क्या लिखूं? ऐसे तो हम देश का इतिहास ही भूल जाएंगे. जाति सामाजिक संरचना है. ऐसे सोशल ग्रुप जो स्टेट से डील कर सके. आप क्या चाहते हैं? कि हम एक इंडिविजुअल को स्टेट से डील करवाएंगे, जैसा यूएस में होता है.
औरंगज़ेब ने कई जैन मंदिर तोड़े थे. वह उसमें गाय काट के फेंक देता था. मगर जैनियों की लॉबी ने औरंगज़ेब से राज्य के ही पैसों से जैन मंदिर बनवाए. जाति ऐसे ही काम करती है. समूह को ताक़त बनाकर. जाति से जुड़े लोग समूह में बेहतर काम कर सकते हैं. बिश्नोई जाति के लोग अपने लिए फंड इकट्ठा करते हैं. स्टेट से डील करते हैं. विज्ञाननंदा स्वामी विज्ञाननंदा वर्ल्ड हिंदू इकोनॉमिक फोरम चलाते हैं. हर जाति की अपनी कन्वेंशन होनी चाहिए, ताकि गर्व की भावना पैदा हो सके.
ईशा – जब यूजीसी ने नए नियम जारी किए थे, तब आपकी उन्हें रोकने में बड़ी भूमिका थी. उन नियमों पर आप क्या कहेंगे?
राहुल दीवान – हां, मतलब जब मैंने वो देखा तो लगा इसको चैलेंज करना चाहिए. विष्णु शंकर जैन को फ़ोन किया. उन्होंने कहा कि वे भी तैयार हैं. जब उन्होंने नियमों को कोर्ट में चैलेंज किया तो केस राहुल दीवान वर्सेस गवर्नमेंट ऑफ इंडिया हो गया. अगर वे नियम यूनिवर्सिटी में किसी भी तरह के भेदभाव के विरुद्ध थे तो उसमें ब्राह्मणों को क्यों अलग रखा गया, उनके साथ भी गलत व्यवहार किया जाता है.
मेरी जानकारी के अनुसार वे नियम किसी आईएएस ऑफिसर ने पास किए थे. हमारे जो मंत्री हैं उन्हें इस बारे में पता ही नहीं था कि यह पास हो गया. मैंने एक मंत्री से सुना कि प्रधानमंत्री मोदी इसे लेकर बेहद ज्यादा गुस्से में थे.
इंदिरा जयसिंह ने खुले तौर पर बोला कि ‘यह तो हम आज से नहीं 10-12 साल से चाह रहे थे. हमें पहले एजुकेशन इंस्टीट्यूशन में घुसना था फिर प्राइवेट में जाना था यह पता नहीं इन्होंने क्यों रोक लगवा दी है?’
मुझे ऐसा लगता है संघर्ष ही उद्देश्य बन गया है. आप हर किसी से बात करो, तो कहेंगे बहुत संघर्ष है, बहुत संघर्ष है. संघर्ष के बाद का भारत कैसा दिखेगा? जीत कैसी दिखती है? आपको आखिर में क्या चाहिए? जिसकी तरफ आप हम सबको मोटिवेट करके ले जाना चाहते हैं? वह बताते ही नहीं हैं.
ईशा – वर्तमान समय में गली मोहल्ले से लेकर सोशल मीडिया तक यह बात लोगों के ज़हन में पहुंचा दी गई है कि हिंदू बहुत बेकार होते हैं. यहां पर भेदभाव होता है, औरतों को नीचा दिखाया जाता. सब मनुवादी हैं, हिंदुत्ववादी हैं. हिंदू पहचान को नेगेटिव बना दिया गया है. उसके बाद कोई कितना ही हिंदू जागरुकता की बात करेगा तो वह आतंकवाद, हिंसक और मनुवादी कहलाएगा. ऐसे में आप इस झूठ को कैसे रोकेंगे?
राहुल दीवान – बिल्कुल, लगातार हमारा पुश बैक नरेटिव होना चाहिए. अगर आप मुझे मार रहे और मैं चुपचाप मार खा रहा हूं तो मैं अच्छा हिंदू हूं और अगर मैं आपका विरोध करता हूं खुद को बचाता हूं या आपकों उल्टा मार देता हूं तो मैं हिंदुत्ववादी हूं. यह धारणा हाल ही में कुछ लोगों द्वारा बनाई गई है जो पूरी तरह से गलत है. आखिरकार कब तक कोई डिफेंसिव मोड में रहेगा.
एस शिवा – हिंदुओं के लिए काम करना और हर समय वामपंती नफ़रत का शिकार होते रहना काफी डिप्रेसिंग होता होगा. आप इससे थकते नहीं हैं?
राहुल दीवान – नहीं, मैं तो बिल्कुल डिप्रेसिंग मोड में नहीं रहता. मैं तो चढ़ती कलां मोड में रहता हूं, ऑप्टिमिज़्म मोड में रहता हूं. कभी-कभी थक जाते हैं. रोज कोई ना कोई लड़ाई थोप दी जाती है. हमें अपने गोल पर अधिक ध्यान देना है. एक तो 2047 तक हिंदू राज्य का गोल आप रख दीजिए. लेकिन एक इंटरमीडिएट गोल आपको रखना है घर वापसी का. बड़े स्तर पर सभी संत समाज को बोलना शुरू होगा. होड़ मच जानी चाहिए. कन्वर्ज़न को रोकना होगा.
एस शिवा – हिंदू फंड को बनाने को मुख्य उद्देश्य क्या था? इस फंड को आप कैसे यूज़ कर रहे हैं? इसके आउटकम से आप संतुष्ट हैं?
राहुल दीवान – 2016 से जब संगम टॉक शुरू हुआ तब धीरे-धीरे करके 2017-18 तक कुछ लोग मदद लेने के लिए आने लगे. रेलवे में काम करने वाला एक ऑफिसर नॉर्थ दिल्ली में कहीं अपना स्कूल चल रहा था. उन्हें फंड्स की ज़रूरत थी तो उन्हें दे दिया. 5,000-10,000 तक मदद कर देते थे. कुछ लोग गंगा साफ़ कर रहे थे, उनको थोड़े पैसे भेजने शुरू किए. ऐसे करते-करते यह फंड बढ़ता गया. फिर मैंने अपनी कंपनी में तीन साल के मुनाफे का 7% फाउंडेशन में डालना शुरू कर दिया. सिर्फ़ अपनी ही कंपनी के पैसों से फंड करना शुरू किया.
साल 2022 में मैंने सोचा कि एक हिंदू फंड बनाते हैं. एक ऐसा संगठन जिसका एकमात्र काम सिर्फ हिंदू हितों के लिए काम करने वालों को फंड पहुंचाना होगा. कोई गुरुकुल बनाना चाहता है, कोई आश्रम बना रहा है, कोई लव जिहाद से लड़ रहा है, कोई मंदिर बना रहा है, केरला में कोई गौ रक्षक है, जो भी संगठन इस तरह के काम कर रहे हैं उन्हें पैसों की तंगी न हो उसके लिए हिंदू फंड को बनाया गया था.
इसका ऑफिशियल नाम हिंदू नेटवर्क फाउंडेशन है, यह सेक्शन 8 कंपनी है. अभी तो किसको फंड देना है, कहां जाएगा? वह सब फैसले मैं करता हूं. उम्मीद है कि यह भविष्य में इंस्टीट्यूशन का रूप लेगा. इसमें बाकी एडवाइज़र्स भी हैं. हिंदू फंड यूएस भी है. हिंदू नेटवर्क फाउंडेशन यूएस में है लेकिन हमारे पास एफसीआरए नहीं है तो भारत नहीं ला सकते. फिलहाल तो हमारे पास अधिक फंड नहीं है. अधिकतर जो फंड है वो मेरा ही दिया हुआ है. एक-दो डोनर हैं बस.
अभी हमारा उद्देश्य 8-10 शहरों में वकीलों की एक टीम तैयार का है. हम उन्हें फंड करेंगे. किसी भी हिंदू विरोधी घटना को उन्हें चैलेंज करना होगा. कोई एफआईआर करना हो, याचिका दायर करनी हो, हम मदद करेंगे. जैसे अभी दिल्ली में एक नव-अंबेडकरवादी ने हिंदू देवी-देवताओं को लकेर बेहद आपत्तिजनक भाषण दिया है. हम उसपर कानूनी कार्रवाई करेंगे. डीएमके के उदयनीधि स्टालिन सनातन को समाप्त करने की बात करता है. उसके लिए गलत भाषा का इस्तेमाल करता है. ऐसे लोगों पर कम से कम 10 शहरों में एफआईआर होनी चाहिए.
दूसरा मुझे कॉर्पस बनाना है. कॉर्पस का मतलब कि इंडोमेंट फंड बना दिया. उसको एफडीज़ में या मार्केट्स में इन्वेस्ट करके रखा जाएगा. तो 1000 करोड़ पर साल का लगभग 100 करोड़ आपको रिटर्न मिल सकता है. मतलब, आप हर महीने हिंदू संगठनों को 10 करोड़ तक की मदद कर सकते हो. अगर यह फंड बन गया तो देश में ट्रांसफॉर्मेशन हो जाएगी. अभी हमारे पास सिर्फ़ 25-30 लाख रुपए ही बचे हैं. कुछ कॉर्पस ही नहीं है, क्योंकि सब खर्चा हो जाता है. सब फंडिंग में निकल जाता है.
एस शिवा – इस फंड में से आपने लीगल कामों में सबसे ज़्यादा पैसा लगाया है. लगबग छह करोड़ के आस-पास. ऐसा क्यों?
राहुल दीवान – क्योंकि हमें एक बड़ी लीगल टीम खड़ी करनी है. फिलहाल हमारा उद्देश्य तमिलनाडु के एचआरसी डिपार्टमेंट को समाप्त करना है. आर्टिकल 26 रीइंटरप्रेट करने के लिए मैंने एक लॉ फर्म हायर की है. वे देश के एक बड़े और नामी वकील हैं और वह बेहद कम फीस में हमारा काम करते हैं. इस काम के लिए उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं फंड कर सकता हूं और मैंने एक ही बार में हां बोल दिया. हम आर्टिकल 26 की रीइंटरप्रिटेशन के पीछे जाएंगे. अगर यह हुआ तो इसका असर सबरीमाला में होगा. तमिलनाडु एचआरसी में होगा. मंदिरों को सरकार से मुक्त करने में इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा. ऐसे कामों में चार-पांच महीने लग जाते हैं. ड्राफ्टिंग, रिसर्च करके कोर्ट जाने में मेहनत और संसाधन लगते हैं. फिलहाल हमारे साथ हर कोई सेवा भाव से ही काम कर रहा है.
आपको केरला में मल्लापुरम में मुस्लिमों के कब्जे से मंदिर को छुड़वाना है तो केसे लड़ने और दोबारा मंदिर बनवाने में मैं मदद करूंगा. आपकी टीम को पेमैंट करने में कभी भी प्रॉब्लम नहीं होगी. मैं यह गारंटी देता हूं. आपके जो एंप्लॉयज हैं जो ग्राउंड पर काम कर रहे हैं उनकी सैलरीज, आपके ऑफिस का रेंटल, आपकी बिजली, पानी सबका खर्चा हिंदू फंड उठाएगा. अभी तक लोग डरते थे कि काम तो शुरू कर देंगे लेकिन पैसा कहां से आएगा. लेकिन अब हम मदद केंगे.
ईशा – सोशल मीडिया और असल ज़िंदगी में वामपंथी, लिबरल सोच वाले लोगों से आप कैसे निपटते हैं?
राहुल दीवान – मैं इन्हें सीरियस नहीं लेता. सोशल मीडिया मुझे बहुत कुछ बोला जाता है. पता नहीं उनमें से कितने भारत के हिंदू हैं और कितने पाकिस्तानी हैंडल्स हैं. मैं डिफेंसिव मोड में आ जाता हूं. इन्हें कोई भी जबाव देने का कोई फायदा नहीं है.
कई लोग मुझे फ्रॉड बोलते हैं. अब मैं क्या करूं? इनकम टैक्स स्टेटमेंट पब्लिकली डाल दूं. वो तो नहीं करूंगा. मैं उनको बोलता हूं भैया बुला लो. संगम टॉक्स पर आ जाओ, वहां ओपन वेबिनार पर आकर सवाल पूछ लो. हिंदू फंड का वेबिनार होता है. लेकिन वे लोग आते ही नहीं हैं.
एस शिवा – कभी-कभी आपको लगता है कि अच्छा जीवन चल रहा था कंपनी में काम करके, इस दिशा में नहीं आना चाहिए था?
राहुल दीवान – हां, मेरा काम अच्छा चल रहा था. लेकिन जब कभी मॉल या किसी ऐसी जगह जाता हूं जहां पर यंग लड़के-लड़कियों को देखता हूं तो लगता हैं इन लोगों के लिए मैं ये सब कर रहा हूं. इनके लिए लड़ रहा हूं. फिर याद आता है कि हम इनके लिए नहीं लड़ रहे. हम देश के लिए लड़ रहे हैं. हम गुरु गोविंद सिंह, शिवाजी महाराज इन सभी की लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं. हम विश्व की सबसे पुरानी सिविलाइजेशन है. हज़ार करोड़ तो इसके लिए कुछ भी नहीं होना चाहिए. अभी मैं एक इंफोसिस के को-फाउंडर से मिला था. उन्होंने कहा कि इस काम में पैसा बड़ी दिक्कत नहीं है. जिन हिंदुओं के लिए यह सब किया जा रहा है उनके विचार इस उद्देश्य को लीड करेंगे. विचारों की एकरूपता नहीं होना दिक्कत है.
अगर अभी मैं कोई बड़ा एंटरप्राइज चला रहा होता तो अलग लेवल पर इनसे बात कर सकता था. अभी मुझे यह समझाने में दिक्कत होती है कि यह वास्तव में एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसपर सारे हिंदू एक होकर काम कर सकते हैं.
एस शिवा – हिंदुओं के ख़िलाफ़ रोज़ाना अनेक अपराध और हिंसा होती है, लेकिन लेफ्ट समर्थित मीडिया इन्हें दिखाती नहीं है. इस तरह की खबरों को सामने लाने के लिए आप क्या कोशिशें करते हैं
राहुल दीवान – फिलहाल देश में ऐसी कोई संस्था नहीं है जो हिंदुओं के ख़िलाफ़ अपराधों को डॉक्यूमेंट कर रही हो और पब्लिश कर रही हो. लोग सिर्फ बातें ही करते हैं लेकिन हमारे पास सबूत के तौर पर कुछ नहीं है. हम एक आर्टिकल नहीं लिख पा रहे हैं किसी भी अख़बार के एडिटोरियल. हम आर्टिकल्स भेजते रहते हैं, कोई पब्लिश नहीं करता. बड़े-बड़े न्यूज़पेपर में से कोई पब्लिश नहीं करता हैं.
ईशा – आप सेक्यूलर शब्द की कैसे व्याख्या करते हैं?
राहुल दीवान – अगर आप हिंदू है तो आप सेक्यूलर हैं. जब हिंदू स्टेट बन जाएगा तो उसका यह मतलब नहीं है कि सभी को वैष्णव फॉलो करना पड़ेगा या सबको शैविज़्म बंद करना पड़ेगा. यहां अनेक रास्ते हैं. ऐसा नहीं है कि इसमें से कोई चुन लेंगे तो हम एक्सेप्टेबल है, बाकी एक्सेप्टेबल नहीं है. यह बात बिल्कुल नहीं है.
संविधान में जो सेक्यूलर शब्द लिखा है उसका मतलब है कि सभी धर्म एक समान हैं. जबकि यह गलत है. यह नेहरू की आइलियोलॉजी है जो गलत है. जबकि एक हिंदू राज्य अपनी मूल परिभाषा के अनुसार सैक्यूलर राज्य ही होगा.
