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डॉ. निवेदिता रघुनाथ भिड़े की किताब से जानें धर्म-अधर्म के मायने

क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर वह कौन सा धर्म है जिसका पालन करने के लिए प्रभू श्रीराम ने माता सीता के लिए अग्नि परिक्षा की स्वीकृती दी? या वह कौन सा धर्म है जिसको पालन करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्घ में कई बार युद्ध के नियमों का उल्लंघन किया?

कई बार हम दुविधा में पड़ जाते हैं, एक ही कर्म किसी समय धर्म माना जाता है और किसी समय अधर्म. यह दो प्रकार की स्थिति है, उसी का नाम द्वैध है. जो इस द्विविधतत्व को नहीं जानते, वे द्वैधमार्ग पर पहुंचकर संशय में पड़ जाते हैं.

अगर आपके भी मन में ऐसे कई प्रश्न उठें हैं तो यह लेख और पुस्तक आपके लिए ही है. जिस पुस्तक की चर्चा हम करने जा रहे हैं, उस पुस्तक का नाम है भारतीय संस्कृति चुनौतियां और सम्भावनाएं. जिसकी लेखिका हैं डॉ. निवेदिता रघुनाथ भिड़े.

डॉ. निवेदिता    विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी की उपाध्यक्ष और एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उन्होंने शिक्षा, चरित्र निर्माण और ग्रामीण विकास के लिए काम किया है. उन्हें 2017 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.

उनकी इस पुस्तक को 6 भागों में और उन्हीं के उपभागों में विभाजित किया गया है. इस पुस्तक में लेखिका हमारी संस्कृति के 6 अभिन्न अंगो की बात करती हैं कि कैसे उन अंगो की वजह से आज हमारी संस्कृति बची हुई है, और कैसे इस संस्कृति से निकले विचार आज भी भारत के हर घर में किसी न किसी रूप में आपको देखने को मिलते हैं.

इस पुस्तक में आपको उन प्रश्नों के भी उत्तर मिलेंगे जो सामान्यत: भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाने के लिए अथवा अज्ञानता के कारण भी पूछे जाते हैं. इस पुस्तक में लेखिका भारतीय संस्कृति को एकात्मक संस्कृति के रूप में निरुपित करती हैं और इसी के माध्यम से उन्होने सारे प्रश्नों के उत्तर दिए हैं.

वह बताती हैं कि, किसी भी संस्कृति का अध्ययन करने के लिए तीन घटकों की आवश्यकता होती है- उस संस्कृति का जीवन दर्शन क्या है? जीवन मूल्य और जीवन तत्व क्या हैं, जो दर्शन से आते हैं? इन मूल्यों का अभ्यास करने के लिए उस संस्कृति ने जिन रीति-परंपराओं, प्रथाओं और प्रणांलियों को अपनाया या जिस जीवन व्यवस्था को अपनाया है, इस प्रकार, तीसरा घटक है जीवन व्यवस्था.

डॉ. निवेदिता रघुनाथ भिड़े

वह बताती हैं कि भारतीय संस्कृति हमेशा से एकात्मता की ओर रही है, एकात्म जीवन दर्शन के कारण, सृष्टि और समाज में लोगों के साथ व्यवहार और बातचीत का आधार, अपनापन, प्रेम और आत्मीयता होता है. यही धर्म है.

स्वामी विवेकानन्द ने भारत के जीवन दर्शन को संपूर्ण ब्रह्माण्ड की आध्यात्मिक एकात्मता कहा. एक महान विचारक, दीनदयाल उपाध्याय ने इसे एकात्म    मानव दर्शन कहा. हम सब एक हैं. हम परिवार से अपने समाज से, अपने राष्ट्र से जुड़े हुए होकर, एक दूसरे से संबंधित और एक दूसरे पर निर्भर हैं. व्यक्ति चाहे कहीं भी हो, गांव हो, मेट्रो शहर हो या छोटा कसबा, पूरे भारत में एकात्म जीवन दर्शन ही है. आप कहीं भी जाएं और पूछें कि ईश्वर कहां हैं और उत्तर मिलेगा- ईश्वर सर्वत्र है. ईश्वर हमारे अंदर भी है और बाहर भी. हम जो कुछ भी देखते हैं, भगवान उसमें भी है और उससे परे भी है. क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जो देश इतना विशाल और विविधतापूर्ण है, वह बिना किसी केंद्रीकृत प्रयास के एकात्म जीवन दर्शन ही साझा करते हैं.

हमने कभी उसे पश्चिम संस्कृति की तरह उपभोग के नज़रिए से नहीं देखा. पश्चिम-केंद्रित विश्व में मनुष्य सोचता था कि वह सृष्टि से अलग है और सृष्टि उसके आनंद के लिए है. अत: मनुष्य ने सृष्टि का शोषण किया. एकात्म जीवन दर्शन होने का कारण हमने सदैव सृष्टि को मनुष्य का विस्तार माना है इसलिए यदि हम सृष्टि को नष्ट करते हैं तो हम नष्ट हो जाएंगे.

पर्यावरण संरक्षण का पश्चिमी दृष्टीकोण उपयोगितावादी है. वे सोचते हैं, मेरे लिए यह आवश्यक है और इसलिए मुझे इसकी रक्षा करनी चाहिए. परंतु भारतीय दृष्टिकोण में सृष्टि को मनुष्य का विस्तारित रूप माना गया है. सृष्टि मनुष्य का अंग है. और पूजनीय है. हम अपने शरीर का ध्यान रखते हैं. किसी को यह बताने की आवश्यकता नहीं कि हमारे हाथ को कीड़ा काट रहा है और उसे निकालना होगा. हम पीड़ा का अनुभव करते हैं और इसलिए हम हाथ का रक्षण करते हैं. इसी प्रकार संवेदनशीलता के कारण अपनेपन की भावना के कारण, आत्मीयता के कारण ही हम पर्यावरण की रक्षा करते हैं.

व्यक्ति एक निरंतर होने वाली चेतना है जो पूरे अस्तित्व को अपने में समाहित करती है. व्यक्ति का विस्तारित रूप परिवार है, परिवार का विस्तारित रूप समाज है, समाज का विस्तारित रूप राष्ट्र है और राष्ट्र का विस्तारित रूप संपूर्ण अस्तित्व है. परिवार, समुदाय, समाज, राष्ट्र और सृष्टि जैसे समष्टि, व्यक्ति के विस्तारित रूप हैं. धर्म प्रत्येक समष्टि के प्रति कर्तव्य है ताकि इन समष्टियों में अपनापन बना रहे.

और ऐसा ही एक उद्धरण महाभारत में मिलता है. जहां विदुर नीति में ऐसा कहा गया है कि किसी एक व्यक्ति के कारण यदि कुल या परिवार बच रहा है तो उसे छोड़ देना चाहिए, यदि एक कुल के कारण गांव बच रहा है तो उसे छोड़ देना चाहिए और यदि एक गांव के कारण पूरा राष्ट्र बच रहा है तो गांव को छोड़ देना चाहिए. और अंत में यह कहा गया है कि आत्म के कारण तुम पृथ्वी तक को छोड़ दो अब यह पूरा चक्र बन गया. बात एक से शुरु हुई थी और आत्म के ही ऊपर खत्म हुई, पर यह आत्म एक व्यक्ति नहीं बल्कि अपने आप में परमात्मा है यहां पर आप उसको माइक्रो और मैक्रो दोनों ही स्वरूप में ले सकते हैं. यहां पर आप भारतीय दृष्टि की समग्रता को समझ सकते हैं. अब अपने मूल प्रश्नों पर आते हैं.

जैसे- श्री राम ने माता सीता को अग्नि परीक्षा देने के लिए क्यों कहा?

उत्तर- श्री राम ने माता सीता को अग्निपरीक्षा देने के लिए नहीं कहा. राम ने सीता से अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए भी नहीं कहा. जब युद्ध के बाद, श्री राम ने हनुमान को सीता के मन की बात जानने के लिए भेजा, तो हनुमान श्रीराम के पास आए और कहा कि माता भक्तवत्सल श्रीराम के दर्शन करना चाहती हैं. राम मौन हो गए. उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं और बहुत देर तक ध्यान में रहे. उनकी आंखों से अश्रु बह निकले. अंत में आह भरते हुए उन्होंने हनुमान से गंभीर स्वर में कहा, ‘विभीषण से अनुमति लेकर सीता को स्नान कराकर और आभूषणों आदि से सुसज्जित करके ले आओ.’ महीनों से अशोक वृक्ष के नीचे बैठी सीता, श्रीराम से उसी वेश में मिलना चाहती थीं. परंतु हनुमान ने श्रीराम के आदेशों का पालन किया.

श्रीराम जानते थे कि सीता के लंका से लौटने के पश्चात लोग तरह-तरह की बातें करेंगे जिन पर किसी का नियंत्रण नहीं हो सकता. लोग इस पूरी बात को किस प्रकार से देखेंगे?

वे कहेंगे. सीता जानती थी कि राम अकेले ही 14000 राक्षसों को आसानी से मार सकते हैं तो एक और राक्षस मारीच को हरा ही सकते थे. वे यह भी जानती थीं कि राक्षस मायावी हैं, फिर भी उन्होंने श्रीराम की सहायता करने के लिए लक्ष्मण को आश्रम छोड़ने के लिए बाध्य किया. तो कौन जानता है कि सीता का अपहरण हुआ था या रावण के साथ जाने के लिए उन्होंने लक्ष्मण को भेजा था? माना कि उनका अपहरण हुआ था, परंतु रावण के बारे में यह भी कहा जाता था कि उसके पास ऐसा आकर्षण था कि वह किसी भी स्त्री को अपने वश में कर सकता था. सीता लगभग एक वर्ष तक लंका में रही थीं, तो कौन जानता है कि क्या हुआ? और फिर भी श्रीराम उन्हें स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि वे भी उनकी सुंदरता के अधीन हैं और समाज में नैतिकता की चिंता नहीं करते हैं. श्रीराम पहले से ही जानते थे कि लोग ऐसी बात करेंगे.

वास्तव में, लोगों की आपत्ति के कारण, राम को किंचित भी इस संभावना पर विचार नहीं करना पड़ा कि सीता अपनी इच्छा से आश्रम से लुप्त हो गई हैं. या ऐसा प्रतीत हो सकता है कि वे स्वेच्छा से आश्रम छोड़ गई होंगी.

रावण को मारकर, श्रीराम सीता से यह नहीं कह सकते थे, अब तुम मेरी हो! इसलिए उन्होंने सीता से कहा मैंने अपने परिवार की प्रतिष्ठा के लिए रावण से युद्ध किया था, तुम अपनी इच्छा से यह आश्रम छोड़ कर चली गई थी इसलिए अब तुम जहां चाहो वहां जाने के लिए स्वतंत्र हो. सीता श्रीराम के इस व्यवहार से बहुत आश्चर्यचकित हुईं. अपने विवाह की शपथ, सुकुमा अवस्था में हुआ विवाह, इतने वर्षों का समर्पित वैवाहिक जीवन को सीता ने श्रीराम को स्मरण कराया. किंतु श्रीराम ने सीता की ओर देखा तक नहीं, क्योंकि यदि वे देखते तो पिघल जाते और जो सीता के हित में करने का सोचा था वह रह जाता. सीता को लगा कि श्रीराम के बिना उनका अस्तित्व निरर्थक है. इसलिए उन्होंने लक्ष्मण से चिता रखने के लिए कहा. सीता आग में कूद पड़ीं. तभी अग्नि देव ने आकर कहा, ‘सीता अग्नि से भी पवित्र है. मैं उसे जला नहीं सकता.’

यह स्पष्ट होना चाहिए कि श्रीराम ने सीता को उसकी पवित्रता सिद्ध करने के लिए नहीं कहा था. जब सीता ने अग्नि में प्रवेश करने का निर्णय किया तो राम जानते थे कि सीता पवित्र है और उसे कुछ नहीं होगा. उन्होंने बाद में अग्नि को यह बताया कि उन्हें पता था कि सीता को अग्नि भी नहीं जला सकती क्योंकि वह पवित्रता से भी अधिक पवित्र थी. इस प्रकार, अग्नि प्रवेश, सीता का निर्णय था. वहां से वे अयोध्या लौट आए.             

ऐसे ही कई उद्धरण महाभारत में भी देखने को मिलते हैं. जब अंत में जब दुर्योधन को छोड़कर सभी कौरव और उसके भाई मार दिए गए तब दुर्योधन युद्ध भूमि से भागकर एक सरोवर में छिप गया. श्रीकृष्ण के साथ पाचों पांडव उसे खोजते हुए आए और उसे वहां छिपा हुआ पाया. जब युधिष्ठिर ने उसे युद्ध के लिए बुलाया तो उसने कहा कि वह अकेला उन सभी के साथ युद्ध नहीं कर सकता, ऐसा करना अन्यायपर्ण होगा. अपनी कदाचित उदारता में युधिष्ठिर ने दुर्योधन को वचन दे दिया कि वह अपने पसंद के हथियार से पांचों में से किसी एक को भी हरा सके तो युधिष्ठिर हार मानेंगे. श्रीकृष्ण यह सब देख रहे थे. श्रीकृष्ण के अनुसार, अधार्मिक दुर्योधन को इतनी उदारता देकर युधिष्ठिर इतने सैनिकों के बलिदान को निष्फल नहीं कर सकते थे. 7 कौरव योद्धाओं ने मिलकर अभिमन्यु को मार डाला था इसलिए दुर्योधन को यह कहने का कोई अधिकार नहीं थी कि वह पांडवों में से किसी एक से युद्ध करेगा. साथ ही युधिष्ठिर को अन्य पांडवो और श्रीकृष्ण से चर्चा किए बिना किसी अयोग्य व्यक्ति के प्रति अपनी उदारता दिखाने का कोई अधिकार नहीं था. यदि दुर्योधन ने गदा से युद्ध करने के लिए भीम के अतिरिक्त किसी अन्य पांडव को चुना होता, तो कोई भी दुर्योधन को पराजित नहीं कर पाता.

भीम के अतिरिक्त कोई भी गदा युद्ध में दुर्योधन की बराबरी नहीं कर सकता था. श्रीकृष्ण ने वेग से कहा, दुर्योधन भीम से डरता है वह निश्चित रूप से भीम के अतिरिक्त किसी और को ही चुनौती देगा. अहंकार ने काम किया और दुर्योधन ने भीम को चुनौती दी.

परंतु दुर्योधन की ओर से यह अधर्म था. दुर्योधन को अपने अहंकार को एक    ओर रखकर नकुल या सहदेव से युद्ध करना चाहिए था. दुर्योधन अपने अहंकार में इतना धुंध था कि उसने अपनी हार को ही आमंत्रित किया.  यदि कोई नाम, प्रसिद्धि, दुख, अपमान और अंहकार के बारे में चिंतित है और समिष्टी की भलाई के बारे में नही, तो वहां जीत संभव नहीं है, धर्म का पालन आसान नहीं है. एक चमू के भाग के रूप में कोई केवल अपने बारे में, अपने दुख और अपमान के बारे में कैसे सोच सकता है? यह अधर्म है. जब हम एक चमू का भाग होते हैं, तो हमें व्यक्तिगत विचारों को त्यागना होगा और समष्टि के हित के लिए प्रयास करना होगा. पांडवों की ओर सभी ने यही किया और कौरवों में से किसी ने यह नहीं किया. इसलिए पांडवों ने धर्म का पालन किया और वे जीत गए. ‘यतो धर्म: ततो जय:’ जहां धर्म है वहां विजय है.

इस पुस्तक में और भी बहुत से महत्वपूर्ण विषयों पर बात की गई है जैसे – जीवन व्यवस्था तंत्र, जाति धर्म, कुल धर्म, वर्ण व्यवस्था सांस्कृतिक मूल्य आदि. इन पर दूसरे भाग में चर्चा की जाएगी.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               

वरुण कांत बाजपाई
वरुण कांत बाजपाई
वरुण कांत बाजपाई छत्रपति शिवाजी महाराज यूनिवर्सिटी से सोशियोलॉजी की पढ़ाई कर रहे हैं.