back to top

सफेद झूठ

लेफ्ट इतिहासकारों की अकबर को महान बनाने की नाकाम कोशिश

भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने बरसों से भारतीयों के दिलों दिमाग में मुगलों के प्रति प्रेम और दया का भाव भरने के लिए खूब मेहनत की है. हालांकि इस काम में वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं. स्कूलों और कॉलेज़ों की किताबों में केवल मुगलों, खासकर अकबर को लेकर खूब तारीफें लिखी गई हैं. अकबर को एक ‘ग्रेट किंग’ का टैग भी दिया गया है. लेकिन इस झूठ के पीछे एक सच्चाई भी छिपी है जिसे वर्तमान समय का भारत सभी के सामने लाना चाहता है. अकबर के किए हुए अपराधों से पर्दा उठाना चाहता है. जिसे वामपंथियों ने सालों से ढक कर रका था.

हम आज तक सुनते और पढते आएं हैं कि अकबर मुगलकाल का एक सहिष्णु और महान राजा था. इस बात की थोड़ी जांच की जाए तो अकबर के महान होने का सारा भ्रम दूर हो जाएगा.  

अपने शासनकाल के 12 वर्ष बीत जाने के बाद अकबर ने सन् 1568ई में चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था. प्रसिद्ध इतिहासकार और प्राच्य विद्वान जेम्स टॉड के अनुसार अकबर ने ‘सफलता का मानक मृत हिंदु शरीरों से उतारे गए जनेऊ के भार को माना था. चित्तौड़ के नरसंहार के बाद उतारे इन जनेऊ का कुल भार साढ़े चौहत्तर मण बताया गया. एक मण 40 किलो का होता है, अत: 2980 किलो जनेऊ एकत्र हुए. हम सोच सकते है कि उस काले दिन पर कितने हिंदुओं का रक्तपात किया गया होगा? साढ़े चौहत्तर मण जनेऊ का ढेर बनाकर यह दिखाने के लिए आगरा ले जाया गया कि मेवाड़ पर अब मुगलों का अधिकार था.’

इतिहासकार श्री के.एस. लाल ने इस दुर्भाग्य दिन हुए हिंदुओं के नरसंहार के विषय में लिखा कि ‘अकबर ने क्रूरतापुर्ण मानस के साथ दुर्ग में प्रवेश किया और चित्तौड़गढ़ की एक बुर्ज़ पर खड़ा हो गया. जिसके बाद नि:शस्त्र और निरीह हिंदु पुरुष, महिलाओं और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया.

अबुल फज़ल के अनुसार 40000 हिंदुओं के अस्तित्व को तथाकथित महान मुगलों का विरोध करने के दंडस्वरूप एक दिन धूल में मिला दिया गया. अकबर ने अपनी रत्नजड़ित तलवार बांरबार लहराते हुए अपने सेनानायकों को आदेश दिया कि जो कोई भी उसके आदेशों की अनुपालना न करते हुए महान मुगलों का विरोध करे, उसे मौत के घाट उतार दो. उसने आदेश दिया कि इस दुर्ग की हवा में सांस लेने वाले प्रत्येक प्राणि, पशु-पक्षी सभी को मार  दो.

इसी समय में चित्तौड़ का तीसरा साका जौहर भी हुआ. जब लगभग 10,000 महिलाओं और बच्चों ने जौहर कर अपने सम्मान की रक्षा की थी. अकबर के समकालीन इतिहासकार, मॉन्सरेट ने लिखा, ‘मुसलमानों के धार्मिक उत्साह ने असंख्य मूर्तियों और मंदिरों को नष्ट कर दिया. जो पहले बहुत अधिक संख्या में हुआ करते थे. हिंदू मंदिरों के स्थान पर अनगिनत मकबरे और अन्य स्मारक बना दिए गए.’

ऐसा कहा जाता है कि अकबर ने अपने दादा बाबर की तरह ‘गाज़ी’ या ‘काफिरों का संहारक’ की उपाधी धारण की थी. यहां तक कि 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा इस किले पर कब्ज़ा करने के बाद भी ऐसी क्रूरता नहीं दिखाई गई थी.    

अकबर के दरबारी इतिहासकार इस नरसंहार को उचित ठहराने का भरसक प्रयास करते हैं. अपने शासनकाल के उत्तरार्ध में जब अकबर की क्रूरता की आलोचना हुई तो, उन्होंने आगरा स्थित अपने शाही महल के द्वार पर पट्टा और जयमाल की हाथियां मूर्तियां स्थपित करके लोगों का दिल जीतने का प्रयास किया.

ऐसी ही एक और घटना का अबुल फज़ल ने वर्णन किया है. हिंदुओं के एक तीर्थ पर हिंदु धर्म के विभिन्न संप्रदाय वहां एकत्रित होकर तीर्थयात्रियों से भिक्षा लेने के लिए अपने-अपने निर्धारित स्थानों पर बैठ गए. पवित्र सरोवर पर एकत्रित कई हिंदु सन्यासियों में से दो गुट करी और पुरी थे. पुरी संप्रदाय ने राजा से शिकायत की कि कुरियों ने अन्यायपूर्वक उनके अभ्यस्त बैठने के स्थान पर कब्ज़ा कर लिया है, शांतिपूर्ण वार्ता विफल होने के बाद दोनों को युद्ध द्वारा विवाद सुलझाने की अनुमति दी गई. आश्चर्यजनक रूप से अकबर ने एक पवित्र स्थान पर यह अनुमति दी. युद्ध तलवारों से शुरू हुआ, उसके बाद बाणों और धनुषों का प्रयोग हुआ. अकबर इस युद्ध का आनंद ले रहा था, वह भी ऐसे स्थान पर जो शांति और सद्धभाव का प्रतीक था. जल्द ही पुरी संप्रदाय संख्या में कम पड़ गया और अकबर ने अपनी शाही सेना मदद के लिए भेज दी अतिरिक्त सहायता के कारण पुरी ने कुरियों को खदेड़ दिया. हालाकि मृतको की संख्या कम थी, लेकिन आप इस घटना से अकबर की मानसिकता का पता लगा सकते हैं.    

ऐसा माना जाता है कि अकबर ने 1582ई को दीने-ईलाही पंथ की स्थापना सर्वधर्म सम्भाव के कारण की थी. लेकिन ऐसा नहीं है इसकी स्थापना का कारण उसकी खलीफा बनने की इच्छा थी, जो वह इस्लाम में रहकर नहीं कर सकता था. इसके पीछे की सोच अकबर की 1579ई में जारी की गई महज़र की नीति में दिखी जिसमें उसने स्वयं को धार्मिक मामलो में उलेमाओं से भी ऊपर घोषित किया और स्वयं को युग का खलीफा भी घोषित किया था. उसने कई बार प्रयास किया, इसी कारण वह भारत की जनता से कर के रूप में सोना, चांदी और कीमते चींजें वसूलता था. और हर वर्ष धन मक्का के लिए भेजता था. लेकिन यह सब करने के बाद भी वह खलीफा बनने में सफल नहीं हुआ. बाद में उसने एक नया पंथ बनाने की घोषणा की पर इसमें भी वह सफल नहीं हुआ क्योंकि किसी और मुस्लिम समुदाय ने इस पंथ को कभी स्वीकार ही नहीं किया. कुछ चुनिंदा मुस्लिम और हिंदु में बीरबल ने इसे स्वीकार किया था.        

इतिहासकार मेधा भास्करन ने एक और पहलू पर प्रकाश डाला है कि अकबर ने अपने कई सारे सहयोगियों को केवल इसलिए मारा कि उनकी उनकी महिलाओं को अपने हरम में ला सके. उसकी साफ सोंच थी की जो उसे चाहिए वह उसे किसी भी कीमत पर ले लेगा.

कई स्त्रोत यह भी दावा करते हैं कि उसके हरम में 5000 से ज्यादा औरते थी जिनमें सबसे कम उम्र की लड़की लगभग 13 साल की थी और लगभग 350 औरतें केवल उसकी बीवियां ही थी. क्या ऐसा शासक किसी भी तरह से महान कहलाया जा सकता है?

इसी हरम में रहनी वाली अनेकों बीवियों में से एक अकबर के संरक्षक बैरम खां की पत्नी भी शामिल थी. बैरम खां वही व्यक्ति था जिसने हुमायूं की मृत्यु के पश्चात अकबर का राजतिलक किया था और उसका संरक्षण किया था. पानीपत के द्वितीय युद्ध में अकबर की उम्र केवल 13 वर्ष थी. उस युद्ध का असली नेतृत्व बैरम खां कर रहा था. इसी युद्ध ने यह साबित किया था कि अकबर भारत पर शासन कर सकेगा या नहीं. क्योंकि उस समय दिल्ली की गद्दी पर बेठे हेमु को हराना आसान नहीं था. उसके पास लगभग 30000 (कुछ स्त्रोत इस संख्या को बढ़ाकर भी बताते हैं) की सेना थी. वहीं अकबर के पास लगभग 10 से 20 हजार सेना ही थी, उसके बावजूद उसने जीत हासिल की. ऐसा कहा जाता है कि हेमु अपनी सेना का नेतृत्व आगे से कर रहा था. (जो उस समय के हिंदु राजाओं की परंपरा थी) और वह युद्ध जीत भी रहा था, लेकिन अचानके से एक तीर उसकी एक आंख में जा लगा और वह अपने हाथी पर से गिर पड़ा. अपने राजा को गिरता देखने के बाद सेना ने भी हथियार डाल दिए और तितर-बितर हो गई और अकबर ने युद्ध को जीत लिया. इतने महत्वपूर्ण युद्ध को जीताने के बाद भी बैरम खां की हत्या स्वयं अकबर ने ही करवाई थी.

अकबर के बारे में चर्चा करने पर जज़िया कर का जिक्र हर बार आता है. इतिहास की किताबों में अकबर के तीर्थ यात्रा कर और जज़िया कर को माफ करने का वर्णन किया गया है. यह सभी कर अकबर के दादा बाबर के द्वारा हिंदुओं पर लगाए गए थे. यह सब निर्णय राजनीतिक रूप से लिए ज्यादा मालूम पड़ते हैं न कि एक धर्म निरपेक्षता की आड़ में लिए गए. अकबर को यहां लंबे समय तक शासन करना था जो बगैर हिंदु जनता के सहयोग के संभव नहीं था.

यहां पर मीना बाज़ार का ज़िक्र करना होगा. उस समय मीना बाज़ार मेला लगाया जाता था, जो विशेष रूप से कमांडरों की महिलाओं के लिए था. आगरा किले के परिसर में मीना बाजार में नौरोज़ मेले का भी आयोजन किया जाता था जहां अकबर और कुछ अन्य उल्लेखनीय पुरुषों को आमंत्रित किया जाता था. नौरोज़ मेले में, मुगल पुरुषों की खुशी के लिए सुंदर लड़कियों को लाने की परंपरा थी.

एक बार अकबर ने एक महिला किरण देवी को इस आयोजन के दौरान पाया और उसकी सुंदरता को लेकर दीवाना हो गया. यह जानने के बावजूद कि वह उनके सहयोगी शक्ति सिंह की बेटी थी, उन्होंने उसका पीछा किया. अकेले होने पर उसका रास्ता रोक दिया. अकबर ने उसके साथ एक रात बिताने की पेशकश की. किरण देवी ने खुद को पृथ्वीराज राठौर की पत्नी बताया, जो अकबर के नौ रत्नों में से एक था.

फिर भी अकबर अपनी वासना को नियंत्रित नहीं कर सका और किरण के करीब गया. अगले ही पल वह तुरंत अकबर की ओर उछली और उसके सीने पर खंजर तान दिया.

अकबर किरण से इसकी उम्मीद नहीं कर रहा था और उसने तुरंत क्षमा मांग ली. किरण देवी ने एक शर्त रखी कि नौरोज़ मेला फिर कभी आयोजित नहीं किया जाएगा. अकबर इस पर सहमत हो गया और इस तरह उसने उसे क्षमा कर दिया. अकबर मुंह पर चुप्पी और शर्म के साथ चला गया.         

मुस्लिम और मुगल होने के कारण लेफ्ट इतिहासकारों द्वारा अकबर को लेकर हमारी पीढ़ी में ज़बरदस्ती जुनून भरा जा रहा है. एक झूठी इमेज़ बनाई जा रही है और इस इमेज़ की सच्चाई सामने लाने वालों को हिंदुत्ववादी करार दिया जा रहा है. इतिहास के मामले में वर्तमान समय बेहद नाज़ुक है. लेफ्ट की हर कहानी को हमें सच्चाई के पैमाने पर तौलकर देखना ही होगा. वरना मुगलों की झूठी तारीफें छापने के चक्कर में हम भारत के लिए लड़ने वाले वीरों की गाथाएं भूल जाएंगे.  

वरुण कांत बाजपाई
वरुण कांत बाजपाई
वरुण कांत बाजपाई छत्रपति शिवाजी महाराज यूनिवर्सिटी से सोशियोलॉजी की पढ़ाई कर रहे हैं.