मिथ्यावाद

फुले की ब्राह्मणों और देश के प्रति गद्दारी

सालों से यह झूठ फैलाया जा रहा हे कि फुले दलित-वंचित परिवार से थे. जबकि यह सच नहीं है. उनका नाम ही सिद्ध करता है कि वे एक फ्लोरिस्ट परिवार से थे. वे भूमिहीन भी नहीं थे. उनके परिवार के पास 35 एकड़ भूमि थी, जो इनाम में दी गई थी. पेशवाओं ने उन्हें इनाम भूमि देने से जातिगत आधार पर वंचित नहीं किया था. वह कोई एहसान नहीं था. उनके पूर्वज ने योग्यता से स्वयं को प्रमाणित किया था. योग्यता का निरादर करने वाली आधुनिक सोच तब नहीं थी.

माली समाज कहीं भी अनुसूचित जाति या जनजाति नहीं माना जाता. वे अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं जो जैसा कि हमने देखा एक अधिसूचना की संक्रिया है, समाज की संक्रिया नहीं है. वे कृषि उद्यमी और नवाचारी माने जाते हैं. कृषि उद्यानिकी (हार्टीकल्चर) उन्हीं का विषय थी. फुले फूल माली थे. ऐसे ही जिरे और हल्दे भी होते हैं जो मालियों के ही उप-समूह हैं और उन्होंने अपने कार्य-वैशिष्ट्य से वह नाम प्राप्त किया है.  

फुले स्वयं स्कॉटिश मिशन हाईस्कूल में पढ़े थे. उनकी ब्राह्मणों से घृणा का कारण यह बताया जाता है कि 1848 में वे एक ब्राह्मण मित्र के यहां विवाह समारोह में गए थे और वे बारात में भी शामिल हुए थे. पर मित्र के माता-पिता के द्वारा वे अपमानित हुए. उन्होंने आरोप लगाया था कि शूद्र होने के कारण उन्हें विवाह समारोह में शामिल नहीं होने दिया गया था.

अब यह बात सर्वथा मनगढ़ंत प्रतीत होती है? मालाकार जाति कब से शूद्र होने लगी? पुत्र ने मित्र बना लिया. मित्र भी ऐसा कि बारात में साथ चले. पर अपने बेटे के उसी मित्र को एक विवाह समारोह में माता-पिता ने शूद्र बताकर बहिष्कृत कर दिया. ऐसे कि जैसे अपने बेटे के इन मित्र की जाति का उन्हें तभी पता लगा. यदि बिना जाति जाने उन्होंने किसी को अपने बेटे का घनिष्ठ मित्र बनने दिया तो उसका अर्थ यह है कि उनमें जाति-चेतना नहीं थी.

यह भी संभव है कि यह कोई इंटरपर्सनल विवाद का मामला हो क्योंकि 1827 से 1848 तक तो ऐसे किसी जातीय दुराग्रह का सामना फुले को नहीं हुआ. 20 वर्ष तक सब ठीक फिर एक घटना की इतनी ज़बर्दस्त प्रतिक्रिया कि इतना व्यापक सामान्यीकरण. फुले की यह मनगढ़ंत कहानी बिलकुल सुसंगत नहीं लगती.  

और फिर उसी वर्ष फुले तात्याराव भिड़े के घर भिड़ेवाड़ा में अपना स्कूल शुरू करते हैं. जो एक चितपावन ब्राह्मण थे. ब्राह्मण द्वारा अपमानित होने के बाद फुले ने ब्राह्मण से ही मदद ली. भिड़ेवाडा को अब एक स्मारक बनाने की घोषणा की गई है पर कितने लोग फुले की कहानी में तात्या भिड़े की मदद का उल्लेख करते हैं?

विश्रामबागवाडा स्थित फुले स्कूल भी बाजीराव पेशवा का था. उनके भाई ने 35 एकड़ जमीन हड़प ली, जिससे उन्होंने एक के आधार पर पूरी माली जाति से ही नफ़रत करनी शुरू कर दी. जबकि ब्राह्मण ही जीवन में हर कदम पर उनकी मदद करते रहे. स्वयं ‘गुलामगिरी’ में उन्होंने कहा कि :

“धोंडीराव : तात, आपने जब ब्राह्मण जाति की लड़कियों के स्कूल की स्थापना की थी, उस समय सरकार ने मेहरबान होकर आपको बड़े सत्कार के साथ एक शॉल भेंट की थी. बाद में उसी तरह आपने अछूतों के लिए भी स्कूल की स्थापना करके उसके लिए कई ब्राह्मणों की सहायता ली थी. और उन सभी स्कूलों में बड़े जोर-शोर के साथ पढ़ाई-लिखाई शुरु हो गई.

जोतीराव : ब्राह्मण जाति की लड़कियों के लिए स्कूल शुरु कर देने की वजह से सरकार को बड़ा आनंद हुआ और उसने मुझे एक शॉल भेंट की, यह बात बिलकुल सच है, लेकिन मुझे जब अछूतों के लड़के लड़कियों के लिए स्कूल शुरु करने की आवश्यकता महसूस हुई, तब मैंने उस काम के लिए कई ब्राह्मणों को सदस्य बनाया और वे सभी स्कूल ब्राह्मणों के हाथों में सौंप दिए.”

ब्राह्मणों के इन सब सत्कार्यों का नतीजा यह कि उन्हें चुन-चुन कर गालियां दी गईं. उनकी सदिच्छाओं और सक्रियताओं का कोई असर न पड़ा. लेकिन क्रिश्चियन मिशनरी सिंथिया फरार का असर पड़ गया. उस्मान शेख और फातिमा शेख का असर पड़ गया. और बाद में दिलीप मंडल बताते हैं कि फातिमा शेख नाम की कोई महिला थी ही नहीं और यह किरदार उन्होंने अपनी कल्पना से खड़ा किया. विकीपीडिया और गूगल ने जिस तेजी से उसे लपका था उसी से संदेह गहरा गया था. 2019-20 से पहले इन मोहतरमा की कोई जानकारी नहीं थी. फिर वे सावित्रीबाई फुले की सहायिका और पहली मुस्लिम एजुकेटर बन बैठीं और इसी तरह सिंथिया फरार का नाम धनंजय कीर की पुस्तक से पहले कहीं कोई व्यक्ति नहीं था. वह 1853 की फुले की एक स्पीच का उल्लेख करता है लेकिन न तो फुले के किसी लेखन में न आंबेडकर के लेखन में उसका फुले से कोई संबंध बताया गया है.

लेकिन क्विंट ने फातिमा को तुरंत उठाया और सावित्री बाई फुले और फातिमा की मैत्री को ‘ए लैसन इन सोलिडैरिटी’ बनाकर पेश कर दिया. गूगल पर डूडल आ गया. विकिपीडिया पर एंट्री हो गई. कुल मिलाकर सहायता करने वाले सच्चे ब्राह्मणों को ठुकरा दिया गया और मृत्योपरांत इन दो नकली नामों को प्रमोट किया ताकि ब्राह्मणों के विरुद्ध दलित-ईसाई-मुस्लिम गठजोड़ खड़ा किया जा सके.

ऐसा एक भी प्रत्यक्ष प्रमाण किसी मराठी स्रोत में नहीं है जो किसी देसी स्कूल में दलितों के विशिष्ट निषेध की नीति बताता हो. ग्रोक से पूछने पर उसने स्वीकारा कि “I must acknowledge that I cannot produce a document from a specific pre-British Maharashtra school (e.g., a named pathshala in Pune) with a written rule stating “Dalits are not permitted.” निकटतम प्रमाण ‘द रिपोर्ट ऑन नैटिव स्कूल्स इन द बोम्बे प्रेसिडेंसी’ (1824–1825) है जिसमें कुनबी, माली आदि शूद्र जातियों को तो देसी स्कूलों में पढ़ाने का तथ्य माना गया है पर महार और मांग जैसी कुछ जातियों के निषेध की बात कही गई है. और यह एक औपनिवेशिक दस्तावेज़ है. कहा यह गया कि यह इसलिए कि देसी स्कूल अनौपचारिक थे और किसी तरह का अभिलेख नहीं रखते थे. क्या ऐसी बातों पर कोई विश्वास कर सकता है?

इतनी सहायता के बावजूद गुलामगिरी पृष्ठ दर पृष्ठ ब्राह्मणों के विरुद्ध बजबजाते निराधार विवरणों से भरी पड़ी है. ज़ाहिर है कि इस तरह की तर्कहीन तथ्यहीन बातों का पुरज़ोर विरोध होता. कोई भी समाज आत्म-गरिमा से इतना हीन नहीं हो सकता. लेकिन उसे ब्राह्मण विरोध के रूप में निरूपित किया गया. विरोध तथ्यहीनता का था, प्रस्तुत जातिगत अन्याय की तरह किया गया.

हाल ही में लोगों ने अनुराग कश्यप पर खूब गुस्सा निकाला. उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 352, 356, 353, 355 के तहत मामला चल सकता है पर मुझे ज्यादा बड़ा आश्चर्य ‘गुलामगिरी’ पर होता है कि ब्राह्मणों के विरुद्ध इतना कुछ कहने के बावजूद स्वतंत्र भारत में भी ऐसी विषैली पुस्तक पर बैन तक लगाने की जरूरत नहीं समझी गई. मनुस्मृति को जलाने वालों के समकक्ष गुलामगिरी को सहने वालों को रखिए और फिर सोचिए कि किस में ज्यादा औदार्य और उदात्तता है.

इसी कारण उन वर्तमान महोदय के स्तर तक उतरने की आवश्यकता प्रत्युत्तर में भी नहीं है. उनकी अगर थोड़ी आलोचना हो जाए तो अपनी पत्नी-बेटी की धमकियों का डिफेंस लेकर आपको और बदनाम करने के अपने गेम को बढ़ाते रहने का अवसर ढूंढ लेते हैं.

मुझे याद पड़ता है कि अलेक्जेंडर कैंपबेल ने ‘द हार्ट ऑफ इंडिया’ नाम की भारत की नौकरशाही और आर्थिक नीतियों का मजाक उड़ाने वाली किताब लिखी थी जिस पर 1958 में प्रतिबंध लगा दिया गया था. पर ‘गुलामगिरी’ जारी रही. क्या ब्राह्मण की तुलना में ब्यूरोक्रेसी एक वर्ग के रूप में ज्यादा बड़ी थी? स्टेनली वोल्पर्ट ने ‘नाइन अवर्स टु रामा’ 1962 में लिखी थी जो मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या तक नौ घंटे पहले से आरंभ घटनाक्रम का विवरण देती है, बैन उस पर भी लगा दिया गया था. पर ‘गुलामगिरी’ पर नहीं.

लेकिन इसी से एक अस्वस्थ प्रवृत्ति ने जन्म लिया. ब्राह्मणों को कुछ भी कहना अकादमिक स्वतंत्रता मान लिया गया. लोगों ने इस पुस्तक का महिमामंडन शुरू कर दिया. इसे कल्चर हेगेमनी के विरुद्ध आंदोलन की प्रवर्तक पुस्तक बताया जाने लगा. इसे ब्राह्मिनिकल आइडियोलॉजीस के विरुद्ध लिखी गई पुस्तक बताया गया. ब्राह्मणों के विरुद्ध लिखने की रक्षा यह कहकर की जाने लगी कि यह ब्राह्मणों के विरुद्ध नहीं, ब्राह्मणवाद के विरुद्ध है जबकि सच तो यह है कि ब्राह्मणवाद जैसा कोई शब्द ‘गुलामगिरी’ में प्रयुक्त ही नहीं हुआ है और जैसा कि अभी अनुराग कश्यप के कथन से स्पष्ट हुआ कि यह कभी भी ब्राह्मणवाद के बारे में नहीं था, यह हमेशा ब्राह्मणों के बारे में था. एक जाति के विरुद्ध ज़हर फैलाने पर जिसके विरुद्ध कार्रवाई होनी थी, वे महात्मा बना दिए गए. तब उस दृष्टि से अनुराग कश्यप एक महात्मा ही हुआ.

यहां एक एक सीधा सवाल यह उठता है कि क्या अंग्रेजों की चापलूसी कर इस देश में महात्मा हुआ जा सकता है? आज फ़ॉरवर्ड प्रेस जैसी मिशनरी पत्रिका जब इसे ‘seed-text of anti-Brahminical consciousness’ बताती है, विकीपीडिया इसे सैमिनल वर्क बताती है तब पता लगता है कि पूरा खेल क्या था? मनमानी स्थापनाएं करो, प्रमाण में एक भी संदर्भ-स्रोत न दो, औपनिवेशिक सत्ता प्रतिष्ठान के अनुकूल रहो और स्वतंत्रता संग्राम की एकीकृत स्पिरिट में दरारें पैदा करो और सैमिनल वर्क का ख़िताब पा लो. देखा जाए तो इन्हीं प्रशस्तियों के कारण मैं भी इस पुस्तक को पढ़ने पर प्रेरित हुआ था पर जब पढ़ा तो लगा कि इतना निचला बौद्धिक स्तर रखने वाली इस किताब को सेमिनल वर्क कहने वाले कितनी विपन्न मानसिकता में पल रहे हैं.

एजेंडा दरअसल कैंसल कल्चर और राजनीतिकीकृत पाठ की आवश्यकता है पर वह किसी गंभीर विमर्श की ज्ञानात्मक पिपासा की संतुष्टि नहीं है. वह सच की क़ीमत पर गालियों का एक्टिविज़्म है. चूंकि औपनिवेशिक सरकार और मिशनरी उद्देश्यों से तालमेल रखना है तो इस अर्थ में उस पुस्तक का शीर्षक सबसे ज़्यादा लेखक के आचरण पर ही ठीक बैठता है. अन्यथा दासता के विरुद्ध लिखी गई ‘अंकल टॉम्स केबिन’ के मुक़ाबले यह पुस्तक बहुत ही बड़ा डिस्अपाइंटमेंट है. उस पुस्तक का अंत इतना त्रासद है जब साइमन लेग्री चाबुक से मार मार कर उसकी जान ले लेता है पर टॉम अपना धर्म, अपना फेथ नहीं छोड़ता है. और ‘गुलामगिरी’ का लेखक अपने शब्दों के कोड़े बरसाता ही इसलिए है कि लोग अपना धर्म छोड़ दें. फर्क है और वह कोई छोटा फर्क नहीं है.

क्या आपको लगता है कि यह ‘गुलामगिरी’ कोई एक इतिहास-विशेष की चीज़ है और अब ऐसी बातों की क्या आवश्यकता है? समस्या यह है कि इसके मूढ़ विचार आगे चलकर एजेंडा चलाने वालों के द्वारा जस के तस अपना लिए गए. एक और प्रमाण इसी पुस्तक में मौजूद है. शंकराचार्य के बारे में इस किताब में लिखा गया है:

“लेकिन उनमें से बचे-खुचे शेष कुतर्की ब्राह्मण कर्नाटक में भाग जाने के बाद उन लोगों में शंकराचार्य नाम अपना कर एक तरह से वितंडावादी वि‌द्या जानने वाला महापंडित पैदा हुआ. उस ब्राह्मणवादी पंडित ने जब यह देखा कि अपने ब्राह्मण जाति के दुष्ट कर्म की धूर्तता की सभी ओर निंदा हो रही है, थ-थू हो रही है और बुद्ध के धर्म का चारों ओर प्रचार हो रहा है, तब उसने यह भी देखा कि अपने लोगों का (ब्राह्मण-पंडित-पुरोहित) पेट पालने का धंधा ठीक से नहीं चला रहा है, इसलिए उसने नया ब्रह्मजाल खोज निकाला. जिन दुष्ट कर्मों की वजह से उनके वेदों सहित सभी ग्रंथों का बौद्ध जनता ने निषेध किया था, उसका उस शंकराचार्य ने बड़ी गहराई से अध्ययन किया और बौद्धों ने जिन बातों के लिए ब्राह्मणों की आलोचना की थी, उसने उनमें केवल गोमांस खाना और शराब पीना निषिद्ध मान लिया. लेकिन उसने बाद में अपने सभी ग्रंथों में थोड़ी बहुत हेराफेरी करके उन सभी में मज़बूती लाने के लिए एक नए मत-वाद की स्थापना की. शंकाराचार्य की उस विचारधारा को वेदांत का ज्ञानमार्ग कहा जाता है.”

यह भूल जाइए कि इन फुले की भौगोलिकी इतनी कमजोर है और इतिहास का ज्ञान भी कि ये शंकराचार्य को कर्नाटक का बता रहे हैं. शंकराचार्य केरल के थे. यदि 1873, जब गुलामगिरी प्रकाशित हुई, के भारत के नक़्शे को देखें तो केरल की जगह तब ट्रावनकोर, कोचीन और मलाबार होते थे जो कर्नाटक से सर्वथा भिन्न थे. कर्नाटक तब बाम्बे प्रेसिडेंसी और निज़ाम के हैदराबाद के कुछ हिस्सों और मैसूर राज्य में बंटा था. शंकराचार्य का जन्म कालडि का है. उनके जन्म के समय वहां चेर साम्राज्य था. मैं कालडि जा चुका हूं. वह कभी भी कर्नाटक में नहीं था.

शंकराचार्य के काम और उनके ‘वेदांत के ज्ञान मार्ग’ को 10 पंक्तियों में समेट लेने वाले इन महान सज्जन के ज्ञान पर दलित चिंतन का विश्वास अभी तक ज्यों का त्यों बना हुआ है. व्ही.टी. राजशेखर जैसे दलित चिंतकों की यह दुष्ट स्थापना देखें कि

“केरल के एक बौने ब्राह्मण, आदि शंकर ने ब्राह्मणवाद के पुनर्जीवन का काम बौद्ध धर्म को नष्ट कर, बौद्धों और उनके तपस्वियों को शारीरिक रूप से नरसंहारित कर और बौद्ध विहारों को हिंदू मंदिरों में बदल कर किया.”

ध्यान दीजिए ‘शारीरिक रूप से नरसंहारित’. लेकिन फुले जब ब्रह्मा को एक लड़ाकू की तरह देख सकते थे तो ये इस “बौने ब्राह्मण” (पुन: याद कीजिए फुले के द्वारा वर्णन की ऐसी ही शैली को) को योद्धा क्यों नहीं बना सकते थे?

इन राजशेखरों को शंकराचार्य की बौद्धिक प्रखरता और तेजस्विता से सहानुभूति न हो, समझ में आता है. लेकिन इन्हें स्वयं बौद्ध धर्म से कोई बड़ी सहानुभति हो, ऐसा भी नहीं है. ये लिखते हैं: “मौर्य युग में बुद्ध धर्म ब्राह्मणों का सबसे बड़ा शत्रु था. इसने ब्राह्मणवाद को लगभग उन्मूलित कर दिया.” ये बौद्ध धर्म को राज्य- सरंक्षण, शत्रुता और उन्मूलन की टर्म्स में देखते हैं. नागार्जुन और कुमारिल भट्ट जैसे बौद्ध दार्शनिकों की कीमत इस तरह के फतवेबाज लोगों के सामने बस इतनी ही हैः “कुमारिल भट्ट, नागार्जुन जैसे ब्राह्मणों ने धम्म की धमनियों में भिक्खुओं के भेष में जहर घोल दिया.” डॉ. एस. राधाकृष्णन इन महाशयों के लिए “शरारती स्कॉलर” हैं क्योंकि उन्होंने स्पष्ट घोषित किया कि बुद्ध हिंदू जन्मे और हिंदू मरे.

खिताब और फतवे बांटने का काम इन ज़हरीले दिमागों में लगातार चलता है. ब्राह्मणवाद का उन्मूलन इस देश में कब हुआ? यदि ‘भिक्खु’ ज़हर है तो आज भी बौद्धों में भिक्खु होते हैं. भगवान बुद्ध के संदेशों को ही इन फतवेबाजों ने पढ़ लिया होता! ब्राह्मन-वग्गा में भगवान बुद्ध ब्राह्मणों के लिए कहते हैं: “One should not a brahman beat/nor for that should He react/ shame! who would a Brahman beat,/ more shame for any should they react.”

यह वही एप्रोच है जो मनुस्मृति में मनु ने अपनाई है. यानी एक तरफ दूसरों से कहना कि ब्राह्मण को न मारो और दूसरी तरफ ब्राह्मण से स्वयं यह कहना कि “अपमान ब्राह्मण का पथ्य है. सम्मानित और पूजित ब्राह्मण दुही जाति हुई गाय के समान खिन्न हो जाता है.” (मनुस्मृति)।

ब्राह्मण को बुद्ध ने राग-द्वेष से मुक्त, धीरवान, क्रोधमुक्त और निर्धार और द्वेषियों के बीच भी मित्रतापूर्ण कहा है. ब्राह्मणों के प्रति बुद्ध के मन में कोई जातीय, वादीय या वर्गीय घृणा नहीं थी, जैसी कि इन महानुभावों में है. कुमारिल भट्ट और शंकर की विद्वत सफलता को एक पल के लिए भी स्वीकारने की बौद्धिक ईमानदारी इन बंधुओं में नहीं है.

जिस अवधि को आज की ये साक्षात् दुष्टताएं मारकाट का समय समझती हैं, यह समय दिडू. नाग, धर्मकीर्ति, चंद्रकीर्ति, वसुबंधु जैसी अद्भुत प्रतिभाओं की सक्रियताओं का समय है. ओलिवेल ने जिन दो चीजों को ब्राह्मनिज़्म की ही परम्परा का अंतर्द्वन्द्व कहा था, यहां उसे दो धर्मो के क्रूसेड में पेश करने वालों का मज़मा लगा हुआ है.

ब्राह्मण बौद्ध धर्म में अर्हतों और संतों की एक सम्मानित उपाधि है. बुद्ध का बहुत-सा दर्शन उनके पूर्व के सांख्य दर्शन की अनुगूंज है. इन दोनों के बीच असमंजनकारी कुछ नहीं था. यदि होता तो कंपूचिया के महान राजा जयवर्मन सप्तम् ने 12वीं शती में अंगकोर- युग में ता प्रोह्म मंदिर जैसी स्थापत्य रचना न बनवाई होती जिसमें ब्राह्मणवाद और बुद्धवाद दोनों का एकत्रण है. वहां विष्णु भी है, समुद्र मंथन भी और वहां बुद्ध की तिरछी मुद्रा में मूर्ति भी है. भगवद्गीता ने ‘ब्रह्म-निर्वाण’ कहा था. उपनिषद ने ब्रह्म पकड़ा, बुद्ध ने निर्वाण.

बृहदारण्यक उपनिषद में जो ‘चेतना की असीम और अनंत संहति’ है वही दिध्यनिकाय में ‘अदृश्य, अनंत और सर्वत्र ज्योतित चेतना’ है. कपिल मुनि का जितना सम्मान हिंदुओं में है, उतना बौद्धों में है. अब गुलामगिरी सांख्यमुनि की तारीफ़ करती है:

“मतलब सांख्यमुनि जैसे बुद्धिमान सत्पुरुषों ने ब्राह्मणों के वेदमंत्र, जादूविधि के अनुसार चमत्कार का प्रदर्शन किया. उसने उन ब्राह्मणों को भी अपने धर्म का अनुयायी बनाया जो पशुओं की बलि चढ़ा कर उत्सव यात्रा के बहाने गोमांस-भक्षण करते थे. उसी प्रकार जो ब्राह्मण घमंडी, पाखंडी, स्वार्थी, दुराचारी आदि दुर्गुणों से युक्त थे और जिन ग्रंथों में जादूमंत्रों के अलावा और कुछ नहीं था, ऐसे ग्रंथों पर तेल काजल का लेप लगा कर अर्थात् उन ग्रंथों को नकारते हुए उसने अधिकांश ब्राह्मणों को होश में लाया.”

सांख्यमुनि नाम की कोई शख़्सियत थी ही नहीं. कपिल मुनि थे और उन्होंने सांख्य दर्शन का निरूपण किया. और हिंदुओं में उनका इतना सम्मान कि गीता में भगवान श्रीकृष्ण मुनियों में स्वयं को कपिल कहते हैं. पर उनकी जिन तथाकथित उपलब्धियों के चलते फुले ने जिस तरह उनकी तारीफ़ की हैं, उसका पता तो स्वयं “सांख्यमुनि” को भी न होगा. वैसे उनकी तारीफ़ का यह भूत भी फुले के सर से उतर जाता यदि उन्होंने सुखसागर पढ़ा होता जिसमें इन्हें भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से ही एक अवतार बताया गया है. अज्ञान कभी कभी गश खाने से बचा लेता है.

बहरहाल, बौद्ध धर्म दुनिया के दूसरे देशों में इसलिए फैला कि वहां की प्रथाओं और विश्वासों से उसकी विशिष्ट पहचान थी, लेकिन अपने गृह-देश में उसकी किसी स्थापना को भारतीय वैचारिकी के वैविध्य-भरे परिदृष्य में समाहित नहीं किए जा सकने की स्थिति कभी नहीं थी. जिस तरह से सांख्य, न्याय और मीमांसा ने हिंदुत्व को किसी न किसी तरह उपांतरित किया, बुद्ध ने भी किया. बौद्ध धर्म भारत में हिंदुत्व में लवलीन हो गया, पर दूसरे देशों में वह इतनी सहजता से संस्यूत और निमग्न नहीं हो सकता था. वहां उसकी उपपत्तियों, ऊहाओं, उसकी तर्कना और उसके व्यूहों का कोई पूर्वेतिहास नहीं था. भारत में जो चीज परंपरा थी (या उसका विस्तार थी), अन्य देशों में वही चीज एक घटना थी. इसे हिंदुत्व द्वारा ‘बौद्धत्व’ को उदरस्थ कर लेने के रूप में प्रचारित करना या किसी ऐसे नरसंहारात्मक उन्मूलन की कल्पना करना जैसा कि पश्चिमी सभ्यताएं करती रहीं, दोनों ही भारत के साथ कलुषित किस्म के द्रोह हैं.


मनोज श्रीवास्तव एक लेखक और पूर्व आईएएस अधिकारी हैं.