मेसी की भारत यात्रा में टीएमसी का खेल

अमेरिका ने फिर अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी वार्षिक रिपोर्ट में भारत को अल्पसंख्यक विरोधी देश साबित करने की कोशिश की है. अमेरिका इसे विश्व भर के देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति का तथ्यात्मक एवं प्रामाणिक दस्तावेज़ घोषित करता है. यूएससीआईआरएफ ने भारत को फिर कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है. रिपोर्ट में बाबरी मस्जिद ढहाने की पुरानी कहानी दोहराई गई है. अयोध्या विवाद के निपटारे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए राम मंदिर के निर्माण को 1992 की घटनाओं से जोड़कर पेश किया गया है. यूएससीआईआरएफ ने इसे ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ के संदर्भ में पेश किया है, जबकि भारत इसे न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रिया के बाद पूरी तरह निपटा हुआ मामला मानता है. आयोग ने आरएसएस को भी निशाने पर लिया है और उस पर धार्मिक नीतियों से लेकर स्कूली किताबों तक में छेड़छाड़ करने के कई आरोप लगाए हैं. हालांकि, भारत इन आरोपों को पहले भी पक्षपातपूर्ण, राजनीतिक और तथ्यहीन बता चुका है.

जहां तक राम मंदिर की बात है, सुप्रीम कोर्ट ने जमीन पर हिंदू पक्ष का दावा सही माना और विवादित स्थल को राम मंदिर बनाने के लिए एक ट्रस्ट को सौंपने का आदेश दिया था. यूएससीआईआरएफ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाने साधते हुए दावा किया है कि संगठन का उद्देश्य धार्म परिवर्तन को रोकना, गोहत्या पर रोक को बढ़ावा देना और स्कूल की पाठ्य पुस्तकों से मुस्लिम शासकों से जुड़े संदर्भ हटवाना जैसे एजेंडों को आगे बढ़ाना है.

यूएसआईसीआरएफ के रिपोर्ट से साफ है कि कुछ विदेशी संस्थान अब खुलकर भारत के विरुद्ध खड़े होने लगे हैं. कभी उनके वित्त विभाग के सलाहकार भारत में ब्राह्मणों के वर्चस्व की थ्योरी फैलाते हैं, तो कभी उनकी एजेंसियां अल्पसंख्यकों पर तथाकथित अत्याचारों की मनगढ़ंत कहानियों की फाइलें जारी कर देती हैं.

रिपोर्ट में पहले कहा गया कि सरकार को धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ भेदभाव करने वाले कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए और उन्हें निरस्त करना चाहिए. इस सिलसिले में धर्मांतरण विरोधी कानून, गोमांस प्रतिबंध कानून, हिजाब प्रतिबंध और नागरिकता संशोधन अधिनियम का ज़िक्र किया गया है जो रिपोर्ट के मुताबिक देश में अशांति के कारण रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार को धार्मिक स्थलों और पूजा स्थलों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए, जिन्हें अक्सर निशाना बनाया जाता है. अल्पसंख्यकों को हिंदू मिलिशिया और गौरक्षक समूहों से बचाने के लिए सरकार को एक राष्ट्रीय एंटी-लिंचिंग बिल भी पारित करना चाहिए.

वर्तमान धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी रिपोर्ट मीडिया एडवोकेसी रिसर्च ग्रुप के द्वारा तैयार की गई है. इस समूह में कौन-कौन संस्थाएं और लोग शामिल हैं उनकी जानकारी सामने आनी चाहिए. इसमें अधिकतर भारत-पाकिस्तानी मूल के लोग हैं. यह ग्रुप भारत में सिविल सोसायटी, संगठनों और अपने समर्थक पत्रकारों के साथ काम करता है. विडंबना देखिए कि इसी महीने कैथोलिक चर्च ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की विचारधारा पर अब तक का सबसे बड़ा हमला किया था. कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ़ इंडिया ने एक बयान जारी कर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के इस दावे की निंदा की थी कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है. सीबीसीएई ने कहा था, कि भारतीय जनता पार्टी आरएसएस की राजनीतिक शाखा है. नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले आरएसएस के एक सीनियर अधिकारी थे, जहां उन्होंने 2002 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान राज्य का नेतृत्व किया था. इन दंगों में अयोध्या से लौट रहे हिंदू स्वयंसेवकों की मौत के बाद हजारों मुसलमानों का नरसंहार किया गया था.

कुछ साल पहले इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल ने अपनी रिपोर्ट में इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाते हुए अमेरीकि प्रशासन से हिंदू उग्रवादी समूहों के नेताओं और सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. साथ ही कहा गया था कि भारत सरकार को तुरंत एक लिंचिंग विरोधी कानून बनाना चाहिए. आईएएमसी ने मांग की थी – कि अमेरिका के राष्ट्रपति ह्यूमन एकाउंटेबिलिटी एक्ट के माध्यम से ऐसे व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाए, जिन्होंने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है या इसमें सहभागी रहे हैं. इसे देखते हुए अमेरिकी प्रशासन को हिंदू चरमपंथी समूहों के नेताओं और सदस्यों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए. अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में कुछ ईसाई, मुस्लिम और अंबेडकरवादी संगठन मिलकर भारत विरोधी और हिंदू विरोधी दुष्ट प्रचार कर रहे हैं.

इस रिपोर्ट को लेकर हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने कहा कि भारत में ऐसी रिपोर्टों के समर्थकों को ध्यान देना चाहिए कि जब आप भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके जुड़े संगठनों की ओर से अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ तथाकथित हिंसा के आरोपों को प्रचारित करते है, तो यह विदेशों में हिंदुओं के प्रति वैश्विक आक्रोश को जन्म देता है, जिससे हिंदुओं की छवि धूमिल होती है. इस कारण अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा ऑस्ट्रेलिया सहित कई यूरोपीय देशों में हिंदू अपराध और हिंसा के शिकार हो रहे हैं. अपनी उत्साहित प्रतिक्रिया देने से पहले इस पहलू पर अवश्य विचार करना चाहिए. दूसरे, अमेरिका में अन्य धार्मिक समुदायों के साथ क्या कुछ हो रहा है, इसे भी उजागर करना चाहिए. हिंदुओं के बारे में एक रिपोर्ट कहती है कि पिछले कुछ समय से उनके विरुद्ध घृणा, दुष्प्रचार और हिंसा में कई गुना वृद्धि हुई है. भारत सदियों से अनेक पंथों, संप्रदायों का देश है. विविधता और सहिष्णुता इसकी संस्कृति थी, है और रहेगी. इसके लिए भारत को किसी बाहरी से सीख लेने की आवश्यकता नहीं है.


आरएल फ्रांसिस एक कैथोलिक दलित हैं, जो धर्म, सामाजिक न्याय और समकालीन मुद्दों पर सक्रिय रूप से लिखते और विचार रखते हैं.