धुरंधर के ट्रेलर को देखकर मालूम हो गया था कि आदित्य धर इस बार भी ‘उरी’ वाला चाकू तेज़ करके लाए हैं. अक्षय खन्ना, अर्जुन रामपाल और संजय दत्त, तीनों अपने हुनर का जादू बिखेर कर एक बार फिर बड़े पर्द पर छा गए. रणवीर सिंह, जिनके बारे में फिल्म रिलीज़ तक यही सवाल बना रहा कि वह कुछ बोलेगें भी या सिर्फ आंखों से ही सभी सवालों को धराशाही कर देंगे? आदित्य धर के निर्देशन में बनी यह स्पाई एक्शन फिल्म अपने तीसरे हफ्ते में भी दर्शकों को सिनेमा घरों तक खींच रही है. कमाई के मामले में भारत में फिल्म का कुल नेट कलेक्शन 566 करोड़ रुपए के करीब पहुंच गया है. जबकि फिल्म का वर्ल्डवाइड कलेक्शन 800 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर गया है. यह अब 2025 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली इंडियन फिल्म बनने की दहलीज पर है. फिल्म जल्द ही ‘कांतारा: द लेजेंड – चैप्टर 1’ के लाइफटाइम कलेक्शन को पीछे छोड़ सकती है.
इस फिल्म की कहानी शुरू होती है कांधार हाईजैक से जहां आईबी के डायरेक्टर अजय सान्याल (आर माधवन) आतंकवादियों से कुछ डील करते हुए नजर आते हैं. जिसके चलते आईबी चीफ साहब ने सोचा कि चलो पाकिस्तान की जड़ ही खोद देते हैं. इसके लिए वे एक मिशन बनाते हैं जिसका नाम है ‘धुरंधर’. इस मिशन का सबसे ख़तरनाक हथियार हमज़ा अली मज़ारी (रणवीर सिंह), जो पाकिस्तान के कराची स्थित ल्यारी इलाके में घुसता है. ल्यारी को फिल्म में सिर्फ लोकेशन नहीं, बल्कि एक हिंसा से भरी दुनिया की तरह रचा है—जहां डर, गैंगवार और सत्ता साथ-साथ चलते हैं. यहीं हमज़ा का सामना फिल्म के अहम किरदार रहमान डकैत (अक्षय खन्ना) से होता है. इसके बाद फिल्म में भारत के ख़िलाफ़ रची जा रही आतंकी साजिश के चलते सभी किरदार आपस में जुड़ते जाते हैं. पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़ा मेजर इक़बाल (अर्जुन रामपाल), एनकाउंटर मास्टर एसपी असलम चौधरी और मनी लॉन्ड्रिंग के सबसे बड़े चेहरे खनानी ब्रदर्स का मकसद आतंक के साये में भारत की जड़ों को हिलाते रहना है. इसी नेटवर्क के बीच हमज़ा अली मज़ारी (रणवीर सिंह) धीरे-धीरे अपनी जगह बनाता है. जो किसी एक दुश्मन से नहीं लड़ रहा, बल्कि पूरे सिस्टम के भीतर घुसकर उसे अंदर से खोखला करने की कोशिश कर रहा है.
फिल्म में पाकिस्तान की पॉलिटिक्स, गैंग वॉर, नकली नोट, डेविड हेडली, मुंबई हमलों की प्लानिंग जैसे विषयों को इस तरह दिखाया गया है कि मानों चार-चार वेब सीरीज़ एक साथ चल रही हों. फिल्म रिलीज़ होने के बाद कुछ ही दिनों में एक गाने, एक डांस और एक किरदार की वजह से फिल्म के पक्ष में माहौल बन गया. इसी गाने और अक्षय खन्ना के अंदाज़ की वजह से फिल्म का सारा लाइमलाइट खन्ना ले गए और रणवीर सिंह कहीं पीछे छूट गए. सोशल मीडिया पर क्लिप्स चलीं, रील्स बनीं, अरबी बीट्स वाला गाना वायरल हुआ और रहमान डकैत का अंदाज़ लोगों के ज़हन में बैठ गया. लेकिन पूरी फिल्म देखने के बाद तस्वीर बिल्कुल अलग दिखती है.
अक्षय खन्ना की तारीफ होनी चाहिए क्योंकि उन्होंने शानदार काम किया है. अरबी गाने में अक्षय खन्ना के डांस ने किरदार के कॉन्फिडेंस को और हाई कर दिया. रहमान डकैत का स्वैग और खौफ कैमरे को पकड़ लेता है और कुछ मिनटों के लिए लगता है कि यह आदमी स्क्रीन खा जाएगा लेकिन ये सीन-बेस्ड इंप्रेशन है, पूरी फिल्म का नहीं. फिल्म देखने के बाद यह साफ हो जाता है कि ‘धुरंधर’ लाइमलाइट छीनने की लड़ाई वाली फिल्म नहीं है. यहां अगर रणवीर सिंह फिल्म की रीढ़ हैं तो अक्षय खन्ना फिल्म की धार हैं.
हालांकि ‘धुरंधर’ से पहले भी अक्षय खन्ना कई बार साबित कर चुके हैं कि वो साइलेंट थ्रेट के मास्टर हैं. उनका रहमान डकैत का रोल बोलता कम है मगर अपनी मौजूदगी से ही एक माहौल बना देता है. रणवीर का किरदार हमज़ा अंदर से टूटा हुआ, बाहर से शांत और खुद के इमोशंस को काबू में रखने वाला जासूस है. वो चिल्लाने, डायलॉग मारने या स्वैग दिखाने नहीं आया. वो ऑब्जर्व करता है, इंतज़ार करता है और सही वक्त पर वार करता है. इसलिए उसकी परफॉर्मेंस धीरे-धीरे असर करती है.
फिल्म के कुछ सीन दर्शकों में सिहरन पैदा करने के साथ-साथ उन्हें सोचने पर भी मजबूर करते हैं. जैसे कि एक सीन में हमज़ा (रणवीर सिंह) एक युवक को हथियार थमाता है जिसका नाम अजमल कसाब है. ये वही अजमल कसाब है जो 2008 के मुंबई हमलों में पकड़ा गया था. यहीं फिल्म यह भी दिखाती है कि जासूसी सिर्फ देशभक्ति नहीं, कई बार देश के खिलाफ गुनाह का बोझ भी दे जाती है.
वहीं फिल्म में मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) द्वारा एक जासूस को टॉर्चर करने वाला सीन फिल्म का सबसे डरावना और दिल को झकझोर देने वाला सीन है. जिसे देख अपनी भावनाओं पर हर समय कंट्रोल रखकर चुपचाप सबकुछ झेल लेने वाला हमजा (रणवीर सिंह) भी पहली बार सिहर जाता है. उसकी आंखों में पहली बार डर उतरता है. यहां हमजा का सिहर जाना यह बता देता है कि हीरो वो नहीं जो दर्द नहीं महसूस करता, बल्कि हीरो वो है जो डर के बावजूद अपने मिशन को पूरा करने में दोबारा से जुट जाता है.
फिल्म का यह सीन दरअसल किसी एक किरदार की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरी जासूसी दुनिया का कड़वा सच सामने रख देता है. यहां जासूसों से वादा सिर्फ इतना होता है कि अगर मिशन सफल रहा तो देश सुरक्षित रहेगा. उनकी पहचान, उनका नाम सब कुछ गुमनामी के अंधेरे में छोड़ दिया जाएगा. फिल्म दिखाती है कि इन जासूसों की कुर्बानी के बदले न उन्हें कोई पहचान मिलती है, न सम्मानपूर्वक शहादत की गारंटी होती है और कई बार तो देश उन्हें अपना नागरिक मानने से भी इनकार कर देता है. न तिरंगा, न सलामी, न सरकारी बयान, बस एक फ़ाइल बंद होती है और कहानी खत्म. धुरंधर’ हमारे देश के इन्हीं अनजान हीरो की कहानी कहती है जिनका नाम कभी इतिहास की किताबों में नहीं आएगा, जिनकी शहादत पर दो मिनट का मौन भी शायद न रखा जाए, लेकिन इनकी वजह से देश में करोड़ों लोग सुरक्षित रहते है.
जहां एक तरफ नरेटिव सेट होने के डर से बॉलीवुड के तमाम निर्देशक और निर्माता ऐसी फिल्मों में हाथ नहीं डालते, ऐसे में जब आदित्य धर जैसे निर्देशक इस सच्चाई को बड़े पर्दे पर दिखाने का बीड़ा उठाते हैं तो सबसे पहले उन्हें अपने ही देश में कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. कुछ तथाकथित बुद्धजीवी फिल्म को बिना समझे उसे “प्रोपेगंडा” कह देते हैं, निर्देशक की मंशा पर शक करते हैं और तो और फिल्म की इस पूरी कहानी को ही खारिज कर देते हैं जो कि हमारे सुरक्षा तंत्र की सबसे दर्दनाक सच्चाई को दिखा रही है. सब मिलकर अनजाने में उसी नैरेटिव को ताकत देते हैं, जो पड़ोस में बैठा दुश्मन देश फैलाना चाहता है. यहीं पर इस फिल्म में अजय सान्याल का किरदार निभा रहे आर माधवन का एक डायलॉग इन परिस्थितियों में एकदम सटीक बैठता है कि “हिंदुस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन खुद हिंदुस्तानी हैं, पाकिस्तान तो दूसरे नंबर पर आता है.” क्योंकि जब कोई देश अपने देश के अनगिनत हीरो की गुमनाम कुर्बानी पर बनी कहानी को सबसे पहले शक की नजर से देखे, तो खतरा सरहद के पार नहीं, उस सोच और विचारधारा से ही पनपने लगता है. ‘धुरंधर’ इसी खतरे की ओर इशारा करती है और शायद यही वजह है कि इस फिल्म ने सिर्फ बड़े पर्दे पर धमाल ही नहीं मचाया बल्कि, देश में एक बहस भी छेड़ दी है.
सच कहें तो फिल्म का सबसे बड़ा धुरंधर निर्देशक आदित्य धर खुद हैं जिन्होंने बिना किसी डर के ऐसे विषय को चुना जिसमें उन्हें शायद पता रहा हो कि उन्हें फिल्म बनाने के बाद अंतरराष्ट्रीय धमकियों का भी सामना करना पड़ सकता है. लेकिन बावजूद इसके आईएसआई की कार्यप्रणाली, आतंकी फंडिंग, मनी लॉन्ड्रिंग, गैंग और स्टेट मशीनरी का गठजोड़, सब इतने विश्वसनीय ढंग से फिल्म में दिखाया गया कि दर्शक खुद ही कनेक्शन जोड़ने लगता है. शायद यही वजह है कि फिल्म देखने के बाद लोग सिर्फ परफॉर्मेंस या एक्शन की बात नहीं करते, बल्कि ये भी पूछते हैं कि “क्या ये सब वाकई हुआ होगा?” और जब सिनेमा ऐसा सवाल पैदा कर दे, तो समझ लीजिए कि मेकर्स ने अपना काम ठीक किया है. ‘धुरंधर’ किसी केस फाइल का दावा नहीं करती, लेकिन यह ज़रूर दिखाती है कि जासूसी और आतंक की दुनिया में कल्पना और हकीकत के बीच की लाइन कितनी बारीक होती है. और इसी लाइन पर चलती हुई यह फिल्म दर्शकों को बेचैन भी करती है, सोचने पर मजबूर भी करती है जो किसी भी थ्रिलर स्पाई ड्रामा की सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाती है.
कुल मिलाकर दर्शकों को ऐसी फिल्मों को जरूर देखना चाहिए क्योंकि ऐसे विषयों पर निर्भीकता और साहस के साथ पूरी सच्चाई दिखाना आसान नहीं होता. लेकिन निर्देशक आदित्य धर ने इस काम को बखूबी कर के दिखाया है. पायरेटेड की जगह इस फिल्म को सिनेमा हॉल में खुद पैसा खर्च कर टिकट लेकर देखना चाहिए. क्योंकि बॉलीवुड में ऐसी फिल्में बार-बार नहीं बनती.
अनुराधा मिश्रा लखनऊ स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.

