बीते दिनों जब फुटबॉल के जानेमाने खिलाड़ी लियोनेल मेसी भारत आए, तो पश्चिम बंगाल में उनके तीन दिवसीय दौरे के दौरान जो अपमानजनक हादसा हुआ, वह न केवल फुटबॉल प्रेमियों का दिल तोड़ने वाला था, बल्कि पूरे बंगाल की साख को धूल में मिला देने वाला था. बंगाल की हर गली-नुक्कड़ से फुटबॉल खिलाड़ी निकलते हैं, यहां के युवाओं में फुटबॉल को लेकर दिलचस्पी साफ दिखआई देती है. लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राज में मेसी जैसे विश्वविख्यात सितारे का जिस घिनौने अंदाज में अपमान हुआ, उससे बंगाल के खून में उबाल आना स्वाभाविक है. दर्शकों की भगदड़, लूटपाट, 50 हजार तक की कालाबाजारी वाले टिकट और खेल मंत्री का अपने परिवार संग मेसी के साथ सेल्फी लेने में मशगूल होना, सरकार के बेहद लापरवाह रवैये को दर्शाता है. यह ममता दीदी की नाकामी का सबसे नया प्रमाण है.
ममता बनर्जी ने दिखावे के लिए एक जांच टीम गठित करने का आदेश तो दे दिया, लेकिन आज तक उसका कोई नतीजा सामने नहीं आया? बंगाल के सरकारी महकमों में इस अव्यवस्था पर कोई मुंह नहीं खोलना चाहता. क्योंकि मामला सीधे टीएमसी सरकार के खेल मंत्री अरूप बिस्वास से जुड़ा हुआ था. बंगाल की पावन धरती से आने वाले रवींद्रनाथ, विवेकानंद से लेकर स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को मानवता, अनुशासन और सुशासन का उपदेश दिया है. लेकिन आज ममता सरकार बेशर्मी की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है. मुख्यमंत्री को केवल अपने ऐशो-आराम, कुर्सी और वोटबैंक से मतलब है. मेसी कांड पर उनकी खामोशी इसका सबसे बड़ा सबूत है. शायद उनकी चुप्पी का कारण है कि इस आयोजन में कोई हिंदू या भाजपा कार्यकर्ता शामिल नहीं था. आगर ऐसा होता तो दीदी मीडिया के सामने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरा ठीकरा हिंदुओं और भाजपा पर फोड़ चुकी होतीं.
यहां ममता बनर्जी की मूर्खता भरी तुष्टिकरण की राजनीति के कुछ काले अध्याय उजागर करना जरूरी है, जो बंगाल की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कलंकित कर चुके हैं. 2024 में कोलकाता के परेड ग्राउंड में 6.5 लाख हिंदुओं ने शांतिपूर्वक, अनुशासित ढंग से श्रीमद्भागवत के श्लोकों का एक साथ सामूहिक पाठ किया. लेकिन सुनियोजित साजिश के तहत दो मुस्लिम युवक चिकन पेटीज बेचने लगे, जो हिंदू धर्म को अपवित्र करने की कोशिश थी. हिंदुओं ने उन्हें धक्का दिया और बस ममता दीदी के कान खड़े हो गए. वोटबैंक खतरे में आया तो फौरन असली रूप में आ गईं. भागवत पाठ करने वाले युवाओं को हिरासत में ले लिया, उनपर मुकदमे लगाए गए और पीड़ितों से माफी मंगवाई गई. पराए धर्म का बोध ममता को भलीभांति है, लेकिन अपने धर्म की पवित्रता को बनाए रखना इन्हें आज तक नहीं आया.
एक और शर्मनाक घटना 2021 में चुनावों के बाद हुई हिंसा से जुड़ी है. चुनाव हारने के बाद टीएमसी गुंडों ने भाजपा कार्यकर्ताओं का कत्लेआम किया. हजारों घर जला दिए, महिलाओं पर अत्याचार किया गया जिसे पूरी दुनिया ने देखा. संयुक्त राष्ट्र तक के निंदा करने का बावजूद ममता चुप रही. सीबीआई जांच की गुहार लगाई, पर ममता ने सुप्रीम कोर्ट जाकर इसपर रोक लगवा दी. अमर्त्य सेन जैसे नोबेल विजेता ने बंगाल की स्थिति पर शर्मिंदगी जताई. 2024 में जयश्री फॉर्मूला विवाद में रामनवमी जुलूस पर पाबंदी लगाई, जबकि मुहर्रम जुलूसों को खुली छूट दी गई. संदीप वांगचुक जैसे विचारक ने बंगाल में हिंदुओं को असुरक्षित बताया. यहां तक की बीबीसी, एनवाईटी जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने बंगाल को ‘हिंदू-विरोधी राज्य’ करार दिया. ममता की ध्रुवीकरण की राजनीति ने बंगाल को दंगाईयों का अड्डा बना दिया है.
सबसे ताजा उदाहरण एसआईआर का है, जहां केंद्र की यह योजना बंगाल के सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए है, वहीं टीएमसी नेता चिल्ला-चिल्ला कर इसका विरोध कर रहे हैं. इस विरोध का कारण शायद 5 करोड़ अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों का बंगाल में बस जाना है जो अब ममता का वोटबैंक बन गए हैं. इतना ही नहीं, टीएमसी द्वारा एनआरसी-सीएए का विरोध कर इन्हें संरक्षण दिया गया. बंगाल की अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने की कगार पर है. बेरोजगारी चरम पर है, लेकिन दीदी को सिर्फ बांग्लादेशी घुसपैठियों की ही फिक्र है. 2023 में मुर्शिदाबाद दंगे में हिंदू घरों पर हमला किया गया, मंदिर तोड़े गए लेकिन ममता ने न एफआईआर दर्ज होने दी, न दोषियों को पकड़ा जा सका. सीएनएन की एक रिपोर्ट में बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने की बात की गई जिसपर किसी का ध्यान नहीं गया.
मेसी के स्वागत में हुई बेइज्जती पर दुनिया भर के अख़बारों ने भारत, खासकर बंगाल का मजाक उड़ाया. “मेसी का स्वागत भगदड़ से” जैसे शीर्षक रखे गए और राज्य की अव्यवस्था को उजागर किया गया. लेकिन ममता दीदी दूध पीती बिल्ली बनी हुई हैं क्योंकि मामले में हिंदू विरोधी एंगल नहीं मिल पा रहा. बंगाल के युवा फुटबॉल के दीवाने हैं, लेकिन दीदी के राज में स्टेडियम लुटेरों का अड्डा बन गया था. स्वामी विवेकानंद का बंगाल आज लुटेरों, घुसपैठियों और तुष्टिकरण की घटिया राजनीति का शिकार है. ममता बनर्जी जैसी कथित ‘दीदी’ ने बंगाल को मूर्खों का राज्य बना दिया है जहां सुशासन का नामोनिशान नहीं है.
लेकिन अब यह सब देखकर बंगाल की जनता जाग चुकी है. 2026 चुनावों में ममता बनर्जी के राज का अंत होगा. और इसके बाद इतिहास उन्हें ऐसी मूर्ख मुख्यमंत्री के रूप में देखेगा, जो वोटबैंक के चक्कर में बंगाल की आत्मा बेच बैठी थी.
दुष्यंत शुक्ला दिल्ली स्थित एक राजनीतिक विश्लेषक और स्वतंत्र पत्रकार हैं.

