आर्यों को विदेशी बताने की फूले और अंग्रेजों की साजिश

प्राचीन सभ्यताओं की भाषा प्राय: रूपकात्मक होती थी. वैसे भी आदिग्रंथों की भाषा में वाच्यार्थ ही नहीं होता था, लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ भी होता था. उसके लिए कवि-मन चाहिए होता था. देश में फूट डालने की कोशिश करने वाला व्यक्ति उसे अपनी घिनौनी सोच से क्या से क्या न बना सकता था इसका बड़ा उदाहरण है फूले की किताब ‘गुलामगिरी.’

ज्योतिराव फूले ने अपनी किताब में ब्राह्मणों और हिंदू धर्म पर अनेकों झूठ लिखे हैं. उनकी इस कोशिश को देखने के बाद सवाल भी उठते हैं कि उन्होंने मिशनरियों और अंग्रेज़ी हुकूमत से टकराने का जोखिम कभी क्यों नहीं उठाया? उन्हें औपनिवेशिकता ताक़तों के सारे जुल्म झेलने वाले धर्म से टकराना इतना सुरक्षित क्यों लगा?

वे अपनी किताब गुलामगिरी में लिखते हैं कि:

“ब्राह्मणों का कहना है ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए तो कुल मिलाकर सभी ब्राह्मणों की आदिमाता ब्राह्मणी ब्रह्मा के किस अंग से पैदा हुई इसके बारे में मनु ने अपनी संहिता में कुछ नहीं लिखा. आख़िर ऐसा क्यों? क्योंकि वह उन विद्वान ब्राह्मणों के कहने के अनुसार मूर्ख दुराचारिणी होगी. इसलिए फ़िलहाल उसे म्लेच्छ या विधर्मियों की पंक्ति में रख दिया जाए. अब ब्राह्मणों को मुख से पैदा करने वाले ब्रह्मा का जो मुख है वह प्रतिमाह मासिक धर्म आने पर तीन चार दिन के लिए अपवित्र होता था या लिंगायत नारियों की तरह भस्म लगाकर पवित्र होकर घर के काम धंधे में लग जाता था, इस बारे में मनु ने कुछ लिखा है या नहीं?”

ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के रूपक के कारण कितने झूठ गढ़े गए हैं. अब जैसे बाइबिल में इसाईयाह Isaiah 26:17–18 (NIV) में कहा गया कि “As a pregnant woman about to give birth writhes and cries out in her pain, so were we in your presence, Lord. We were with child, we writhed in labor, but we gave birth to wind, अगर इस “gave birth to wind “ को उसी तरह समझा जाए जैसे इन्होंने ब्रह्मा के बारे में समझा तो क्या यह सुरुचिपूर्ण होगा?

फूले और फूले जैसे लोगों ने दृष्टि रूपकों को कभी नहीं समझा जबकि भाषा स्वयं मृत रूपकों का जीवाश्म है. ये वे लोग हैं जिन्हें किसी रूपसी की आंखों को समुद्र कहना हो तो कहेंगे कि समुद्र में तो कचरा गिरा होता है, कि जब कहा जाये कि तारे एक दूसरे से अपना रहस्य फुसफुसाते हैं तो ये कहेंगे कि उनका डेसीबेल क्या है? इनके पास अपने ही देश के लोगों के प्रति इतनी घृणा है कि इनके जीवन की कविता और कविता के सभी भाव मर गए हैं.

इन्हें ब्रह्मा की ब्रह्माणी नहीं पता. ये उसे ब्राह्मणी कह रहे हैं. विराट् पुरुष का वह रूपक खुद लुई ड्यूमा द्वारा भी नहीं समझा गया था और उसने इसमें वर्णों का अधिक्रम देखी थी. उसने विराट् पुरुष को homo hierarchicus कहा था और ‘गुलामगिरी’ को पढ़ने के बाद लगता है कि उसकी समझ और अभिरुचि का स्तर फुले से तो बहुत अच्छा था.

वास्तव में पुरुष कहने का अर्थ था कि यह वर्ण विचार जैविक ( आर्गेनिक) था.

पुरुष कहने का अर्थ था कि यह वर्ण-विचार सह-निर्भरता से स्पन्दित होता है. जिस तरह से शरीर की एक कोशिका तक में आई गड़बड़ पूरे शरीर की लय बिगाड़ देती है, वैसे ही ये वर्ण भी एक कोवर्किंग में हैं. लेकिन किसी ने भी न सोचा था कि पुरुष के मुख से उत्पन्न – अजायत्- कहे जाने के रूपक को लेकर इतना गलत अर्थ लिया जाएगा कि पुरुष के मुख में मासिक धर्म खोजा जाने लगेगा. इस पुस्तक के ये दोनों संवादकर्ता निश्चित रूप से Captain Literal कहे जाने लायक हैं.

अगर हिंदू अवतारों की सिर्फ निन्दा की होती तब भी समझा जा सकता था, लेकिन गुलामगिरी में औपनिवेशिक ताक़त के हित तब ही सधते जब हिंदू समाज के एक धड़े को दूसरे धड़े से भिड़ाया जाए. फुले ने इस कार्य को करके दिखाया. इसे करने के लिए उन्हें कोई भी ऊटपटांग कहानी ही तो गढ़नी थी और कहानी गढ़ने के लिए किसी शास्त्रीय संदर्भ की भी जरूरत नहीं थी न किसी प्रमाण की.

इसलिए फूले परशुराम को महारों से भिड़ाकर लक्ष्य की पूर्ति करते हैं. उनके अनुसार महार वस्तुतः महाअरि थे. आगे की कहानी उन्हीं के शब्दों में:

“प्रजापति (ब्रह्मा) के मरने के बाद शेष महाअरियों ने ब्राह्मणों के जाल में फंसे हुए अपने भाइयों को गुलामी से मुक्त करने के लिए परशुराम से इक्कीस बार युद्ध किया. शेष जितने महाअरियों को परशुराम ने युद्ध भूमि में कैद करके रखा, उन पर उसने कड़े प्रतिबंध लगा कर रखा था. उन महअरियों को कभी भी ब्राह्मणों के विरुद्ध कमर नहीं कसनी चाहिए, ऐसी शपथ उनको दिलाई गई. उसने सभी के गले में काले धागे की निशानी बंधवाई और उनपर शूद्र भाइयों को नहीं छूने का सामाजिक प्रतिबंध लगाया. बाद में परशुराम ने उन महाअरी क्षत्रियों को अतिशूद्र, महार, अछूत, मातंग और चांडाल आदि नामों से पुकारने की प्रथा प्रचलित की. इस तरह के गंदे प्रचलन के लिए दुनिया में कोई मिसाल ही नहीं है. इस शत्रुतापूर्ण भावना से महार, मातंग आदि लोगों से बदला चुकाने के लिए उसने हर तरह से घटिया से घटिया तरकीबें अपनाई. उसने अपने जाति-बिरादरी के लोगों की बड़ी-बड़ी इमारतों की नींव के नीचे कई मातंगों को उनकी औरतों के साथ खड़ा करके, उनके बेसहाय चिल्लाने से किसी की अनुकंपा होगी, इसके लिए उनके मुंह में तेल और सिंदूर डाल कर उन लोगों को जिंदा अवस्था में ही दफनाने की परंपरा शुरू की. जैसे-जैसे मुसलिमों की सत्ता इस देश में मजबूत होती गई, वैसे-वैसे ब्राह्मणों द्वारा शुरु की गई यह अमानवीय परंपरा समाप्त होती गई. लेकिन इधर महाअरियों से लड़ते-लड़ते परशुराम के इतने लोग मारे गए कि ब्राह्मणों की अपेक्षा ब्राह्मण विधवाओं की व्यवस्था किस तरह से की जाए, इसकी भयंकर समस्या ब्राह्मणों के सामने खड़ी हो गई. तब कहीं जाकर उनकी गाड़ी रास्ते पर आई. परशुराम अपने ब्राह्मण लोगों की हत्या से इतना पागल हो गया था कि उसने बाणासुर के सभी राज्यों के क्षत्रियों को समूल नष्ट करा देने के इरादे से अंत में उन महाअरी क्षत्रियों की निराधार गर्भवती विधवा औरतों को, जो अपनी जान बचाने के लिए जहां-तहां छुप गई थीं, उन औरतों को पकड़-पकड़ कर लाने की मुहिम शुरु कर दी.”

अब आप सोचते ही रहिए कि प्रजापति ब्रह्मा के मरने का तो कहीं उल्लेख नहीं. वह छोड़ें अन्य कथनों का भी क्या किसी भी शास्त्र या पुराण या किसी भी जगह कोई उल्लेख मिलता है? यह झूठी जानकारी इन्हें कहां से प्राप्त हुआ. ब्राह्मण ग्रंथकारों की आलोचना करने वाले फूले ने अपनी पूरी पुस्तक में इस संदर्भ ही नहीं किसी भी संदर्भ में कोई ग्रंथ उद्धृत नहीं किया यह शैली साफ तौर से मिशनरी शैली है जो आज तक भी चली आई है. 200 सालों से बिना किसी प्रमाण के ऐसा ज़हर हिंदू समाज के कई वर्गों और जातियों के दिलों में उतारा जा रहा है. परशुराम के विरुद्ध इसकी यह मनगढ़ंत बातें आगे भी चलती है:

“पश्चाताप का परिणाम उस पर इतना बुरा हुआ कि उसने अपनी जान कहां, कब, और कैसे खो दी, इसका किसी को कोई पता नहीं लग सका.”

यहां पूले राम से “युद्ध में” हारने के पश्चात्ताप की बात बता रहे हैं. लेकिन वास्तव में त्रेता युग के बाद द्वापर आया था और परशुराम वहां भी मौजूद थे. कर्ण वाला प्रसंग हो या भीष्म वाला- इसलिए राम से तथाकथित युद्ध में हारने के बाद परशुराम का पता न लगने की बात भी उतनी ही बेसिरपैर की है जितनी ऊपर के उद्धरणों में लिखी अन्य बातें. महारों को ब्राह्मणों से भिड़ाने के अलावा इनका कोई उद्देश्य नहीं है. और परशुराम के किसी महाअरि जाति से लड़ने तक का कहीं कोई शास्त्र-उल्लेख नहीं है.

ऐसे सामाजिक विद्वेष फैलाने वाले को समाज सुधारक बताना विद्रूपता की हद है. यहां बात कथा के मूल्यों को अपनी कुंठा से कुंठित करने की भी है. मसलन भगवान विष्णु की छाती पर भृगु के द्वारा लात मारने की कथा. उस कथा को हम सब क्षमा को एक बड़े मूल्य की तरह स्थापित करने वाली कथा के रूप में जानते हैं. लेकिन फूले इसपर लिखते हैं:

“बड़ी आसानी से शेष सभी भोले- भाले क्षेत्रपतियों के दिलो-दिमाग पर ब्राह्मणों की विद्या का डर फैल गया था. इसका प्रमाण इस तरह से दिया जा सकता है कि ‘भृगु नाम के ऋषि ने जब विष्णु की छाती पर लात मारी, तब विष्णु ने ऋषि के पांव को तकलीफ हो गई होगी, यह समझ कर उसने ऋषि के पांव की मालिश करना शुरु किया. अब इसका सीधा-सा अर्थ स्वार्थ से जुड़ा हुआ है. वह यह है कि, जब साक्षात आदिनारायण ही, जो स्वयं विष्णु है, ब्राह्मण की लात को बर्दाश्त करके उसके पांव की मालिश की अर्थात सेवा की, तब हम जो शूद्र लोग हैं, यदि ब्राह्मण अपने हाथों से या लातों से मार-पीट कर हमारी जान भी ले ले, तब भी हमें विरोध नहीं करना चाहिए.”

क्या इस अर्थ का हमें कभी ध्यान आया? क्या इस कथा में शूद्र की कहीं चर्चा भी है? रहीम इस कथा के मर्म पर पहुंच गए और कहा :

छिमा बड़न को चाहिए, छोटेन को उतपात।

का रहिमन हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात॥

लात हरि को पड़े और घट गुलामगिरी पर जाये, यह विकटबुद्धि का ही कमाल हो सकता था. जब अंग्रेजों द्वारा काम ही इस या उस बहाने ब्राह्मणों के विरुद्ध शूद्रों को भड़काने का दिया गया हो तो उन्हें मनचाहे मतलब निकालकर घटिया से घटिया कथाएं गढ़नी थीं. अभी तक गुलामगिरी ब्रह्मा और ब्राह्मणों को समीकृत करती आई थी. पर भृगु ने तो अपनी परीक्षा में ब्रह्मा को भी फेल कर दिया तो ब्राह्मणवाद का आरोप वहीं ध्वस्त हो गया.

लेकिन इन्हें अपने एजेंडे के सिवाय किसी और बात से मतलब नहीं था. इसलिए वेद की ऋचाओं और सोम के बारे में इनकी राय यह थी:

“ब्राह्मण-पुरोहित लोग सोमरस नाम की शराब पीते थे और उस शराब के नशे में बड़बड़ाते थे और कहते थे कि ‘हम लोगों के साथ ईश्वर बात करते हैं.’ उनके इस तरह के कहने पर अनाड़ी लोगों का विश्वास जम जाता था, उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती थी.”

यह बात वेद और सोमरस के संबंध में सच हो न हो, इन गुलामगिरी पुस्तक के अंतर्गत दोनों संवादकर्ताओं पर अवश्य लागू होती है कि इस पुस्तक में वे जो बड़बड़ाए जिस किसी भी चीज का सेवन कर, उस पर अंग्रेजों और उनके चापलूसों का इतना विश्वास तो जम ही गया और उनमें इतनी श्रद्धा तो उत्पन्न हो ही गई कि उन्हें महात्मा का टाइटल दे दिया गया.

अंग्रेजों का एजेंडा सिर्फ ब्राह्मणों और हिंदू अवतारों के ख़िलाफ़ देश के लोगों में ज़हर घोल देने से पूरा नहीं होता था. उन्हें भारत में अपने होने की कोई संरचनात्मक वैधता नहीं दिखाई देती थी. क्योंकि वे सरासर बाहरी थे. ऐसे में उनकी मनोवैज्ञानिक क्षतिपूर्ति एक ही तरह से हो सकती थी कि स्वयं औपनिवेशितों को बाहरी बता दो. उनके दो उद्देश्य थे- एक भारत में सामाजिक तनातनी पैदा करना और दूसरे भारतीयों को अपनी ही तरह बाहरी बताना, इसलिए इन उद्देश्यों की इंटर-सेक्शनलिटी से यह कहानी बनी कि आर्य बाहर से आए थे और आर्यों में शूद्र नहीं आते थे, वे स्थानीय थे. वे मूलनिवासी थे.

इसी झूठी कहानी को बहुत भोंडे तरीके से ज्योतिराव फूले ने ‘गुलामगिरी’ में बिना हिचक अंग्रेजों के अनुसार रखी:

“ज्योतिराव : वास्तव में, हर दृष्टि से सोचने के बाद हम इस निर्णय पर पहुंचते है कि ब्राह्मण लोग समुद्रपार जो इराण नाम का देश है, वहां के मूल निवासी हैं.

पहले जमाने में उन्हें इराणी या आर्य कहा जाता था. इस मत का प्रतिपादन कई अंग्रेजी ग्रंथकारों ने उन्हीं के ग्रंथों के आधार पर किया है. सबसे पहले उन आर्य लोगों ने बड़ी-बड़ी टोलियां बनाकर देश में कई बर्बर हमले किए. यहां के मूल निवासी राजाओं के प्रदेशों पर बार-बार हमले करके बड़ा आतंक फैलाया. फिर (बटू) वामन के बाद आर्य (ब्राह्मण) लोगों का ब्रह्मा नाम का मुख्य अधिकारी हुआ. उसका स्वभाव बहुत जिद्दी था. उसने अपने काल में यहां के हमारे आदिपूर्वजों को अपने बर्बर हमलों में पराजित कर उन्हें अपना गुलाम बनाया. बाद में उसने अपने लोग और इन गुलामों में हमेशा-हमेशा के लिए भेद-भाव बना रहे, इसलिए कई प्रकार के नीति नियम बनवाए. इन सभी घटनाओं की वजह से ब्रह्मा की मृत्यु के बाद आर्य लोगों का मूल नाम अपने-आप लुप्त हो गया और उनका नया नाम पड़ गया ‘ब्राह्मण’.

धोंडीराव : इस देश में (बटू) वामन के पहले इराण से आर्य लोगों के कुल मिला कर कितने जत्थे आए होगें ?

ज्योतिराव : इस देश में आर्य लोगों के कई जत्थे जलमार्ग से आए.

धोंडीराव : उनमें से पहला जत्था जलमार्ग से लड़ाकू नौका से आया था या किसी और मार्ग से?

ज्योतिराव : लड़ाकू नौकाएं उस काल में नहीं थीं. इसलिए वे जत्थे छोटी-छोटी नौकाओं पर आए थे और वे नौकाएं मछलियों की तरह तेज़ी से पानी पर चलती थीं. इसलिए उस जत्थे के अधिकारी का उपनाम मत्स्य हो गया होगा.”

अंग्रेज़ों ने दलितों को यही आश्वासन दिया होगा कि हम तुम्हें देश के मूलनिवासी मानकर देश तुम्हारे ही हवाले करेंगे. आर्य तो बाहरी हैं. बाद तुम इन्हें भी बाहर खदेड़ देना. अंग्रेजों ने अपने पीछे फूले जैसे झूठ फैलाने वाले लोगों को छोड़ा जो उनकी देश को तोड़ने की साजिश को आगे बढ़ाते रहे.

हालांकि सवाल यह भी उठता है कि क्या आर्य ईरान से समूचे ही समूचे चले आए थे, पीछे कुछ भी छोड़े बिना. यह वर्ण व्यवस्था ईरान में क्यों नहीं मिलती? वे अपना देश किसके हाथ सौंप आए थे. क्या जब अंग्रेज भारत आए तो इंग्लैंड से सब कुछ मिटाकर आए थे? क्या स्पेन के लोग जू लैटिन अमेरिका पहुंचे तब स्पेन को मिटाकर गए थे? यदि आर्य टोलियों में आए थे जैसा कि फूले कहते हैं, ऐसे में ईरान में भी कुछ आर्य होने चाहिए.

क्या आर्यों भारत आकर अंग्रेजों की तरह देश को उपनिवेश बनाना चाहते थे. यदि ऐसा था तो आर्यों द्वारा पैसा ईरान क्यों नहीं भेजा गया? और यदि यह सेटलर कॉलोनाइजेशन था तो स्थानीय निवासी का दावा करने वाले शूद्र निर्मूल क्यों नहीं कर दिए जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में स्थानिकों की संख्या नाम मात्र की रह गई. भारत में तो वे बहुजन हैं. यदि शूद्र आर्य नहीं होते थे तो इस हिसाब से आर्यों की संस्कृति और अच्छी आपके मानी जानी चाहिए थी.

अगर फूले आर्यों से जुड़े सवाल अंग्रेजों से करते तो उनके गुलाम कैसे बन पाते? अंग्रेजों ने पहले देश को गुलाम बनाने में इनकी मदद ली और फिर इन्हीं के ज़रिए देश में फूट डालकर अपना शासन आसानी से चलाया. भारत को जातियों में बांटने का सिलसिला अभी का नहीं है, बहुत पुराना है.


मनोज श्रीवास्तव एक लेखक और पूर्व आईएएस अधिकारी हैं.