सरदार पटेल के साथ नेहरू का विश्वासघात

किसी व्यक्ति का महत्व उसके गज़र जाने के बाद ही समझ आता है. अफसोस की बात है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. 15 दिसंबर, 1950 सुबह 9:37 बजे जब भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने मुंबई के बिड़ला हाउस में अंतिम सांस ली, तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक ऐसा कदम उठाया जो भारतीय राजनीति के इतिहास में एक कलंक के रूप में दर्ज हो गया. नेहरू ने अपने मंत्रियों और सचिवों को निर्देश दिया कि वे अंतिम संस्कार में शामिल न हों. सिर्फ इतना ही नहीं सरदार पटेल को आवंटित सरकारी कार तत्काल वापस ले ली गई और अधिकारियों को अपने खर्च पर यात्रा करने का आदेश दिया गया.

नेहरू की मानवता उस दिन ही मर गई थी. इतिहासकार के.एम. मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘पिलग्रिमेज टू फ्रीडम’ में इस बात का प्रमाण दिया है. उन्होंने किताब में लिखा था कि नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से भी अनुरोध किया कि वे अंतिम संस्कार में न जाएं. लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया. एन.वी. गाडगिल, सत्यनारायण सिन्हा और वी.पी. मेनन ने भी साहस दिखाते हुए इस अमानवीय निर्देश की अवहेलना की. यह नेहरू की उस व्यक्ति के प्रति जिसने 565 रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत को अखंड बनाया था, राजनीतिक ईर्ष्या की पराकाष्ठा थी.

तत्कालीन प्रधानमंत्री का इस निचले स्तर का रवैया देखकर पता चलता है कि देश के सर्वोच्च पद से भी आए कुछ आदेश पालन करने लायक नहीं होते. पटेल और नेहरू के दृष्टिकोण अलग-अलग थे, लेकिन नेहरू को राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत द्वेष में तब्दील नहीं करना चाहिए था.

नेहरू के मुक़ाबले सरदार पटेल की उपलब्धियां अद्वितीय थीं. 1948 में, पटेल हैदराबाद में तत्कालीन शासक निज़ाम के रक्तपातपूर्ण शासन को समाप्त करने के लिए भारतीय सेना भेजने के पक्ष में थे. नेहरू ने पटेल के इस निर्णय का विरोध करते हुए उन्हें ‘पूर्ण सांप्रदायिक’ तक कह दिया था.

एक अन्य उदाहरण में, पूर्वोत्तर के मुद्दे पर नेहरू चाहते थे कि विदेश मंत्रालय इससे निपटे, जिसका पटेल हमेशा विरोध करते थे. जूनागढ़ का विलय कराने और कश्मीर में भारतीय सेना भेजकर श्रषि कश्यप की भूमि को भारत से जोड़े रखने के उनके यागदान को भुलाया नहीं जा सकता. लेकिन नेहरू ने कश्मीर को देश का हिस्सा नहीं स्वीकारते हुए संयुक्त राष्ट्र जाने का निर्णय लिया, जिसके खिलाफ पटेल खड़े हुए थे. 7 नवंबर, 1950 को पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर चीन के खतरे के बारे में चेतावनी दी थी, लेकिन नेहरू ने उनकी अनदेखी की. जिसका परिणाम 1962 में भारत की करारी पराजय के रूप में सामने आया.

नेहरू और फिर उनकी पार्टी, कांग्रेस के पटेल के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैये को करीब से जांच की आवश्यकता है. सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण प्रकरण भी नेहरू की दोहरी मानसिकता को उजागर करता है. मुंशी के अनुसार, कैबिनेट ने पहले सरकारी खर्च पर पुनर्निर्माण को मंजूरी दी थी, लेकिन गांधी की सलाह पर पटेल ने स्वैच्छिक योगदान का मार्ग चुना. पटेल की मृत्यु के बाद नेहरू ने इस परियोजना में मुंशी की भागीदारी की कड़ी आलोचना की, जबकि प्रारंभिक निर्णय में स्वयं नेहरू शामिल थे.

सबसे दुखद पहलू यह है कि कांग्रेस ने 64 वर्षों तक सरदार पटेल का कोई राष्ट्रीय स्मारक तक नहीं बनने दिया. जबकि अस्पतालों, कॉलेजों और न जाने कितनी ही सुविधाओं को गांधी परिवार के नाम पर उंगलियों पर गिना जा सकता है; यह अपने आप में ही सब कुछ बयां करता है. नेहरू ने यहां तक की व्यंग्यपूर्वक सुझाव दिया था कि ‘किसान नेता’ पटेल की याद में गांवों में कुएं खोदे जाएं. आज जब कांग्रेस ओबीसी अधिकारों की चिंता करने का दिखावा करती है, तब यह विडंबना सामने आती है कि पटेल जैसे महान ओबीसी नेता को परिवारवादी राजनीति के चलते उन्होंने दशकों तक दरकिनार रखा गया.

वर्तमान सरकार ने इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारते हुए 31 अक्टूबर, 2018 को गुजरात के केवड़िया में 182 मीटर ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का निर्माण करवाया. विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा, जिसकी लागत 2,989 करोड़ रुपए थी. 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 को हटाकर पटेल के सपने को पूरा किया गया. सरदार की जयंती को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ घोषित किया गया. 2025 में उनकी 150वीं जयंती पर देशभर में एकता यात्राएं निकाली जा रही हैं.

हिंदोल सेनगुप्ता ने अपनी पुस्तक ‘द मैन हू सेव्ड इंडिया’ में लिखा है कि पटेल की व्यावहारिकता ने ही भारत को एक राष्ट्र का रूप दिया. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1959 में अपनी डायरी में लिखा, ‘आज जिस भारत के बारे में हम सोच-विचार और बात कर सकते हैं, उसका श्रेय काफी हद तक सरदार पटेल की दूरदर्शिता और दृढ़ प्रशासन को जाता है.’ फिर भी हम उन्हें नजरअंदाज करते आए हैं. पटेल के राष्ट्र को एक रखने के प्रयासों के बारे में जानने पर हमें पता चलता है कि राष्ट्र निर्माण में पटेल की निर्णायक भूमिका कितनी मूलभूत थी, भले ही उनकी विरासत को दशकों तक दरकिनार किया गया हो.

इतिहास गवाह है यदि सरदार पटेल न होते, तो आज भारत टुकड़ों में बंटा होता. उनके साथ किया गया व्यवहार राजनीतिक कुंठा और घटिया परिवारवादी सोच का परिणाम था.

पटेल की स्मृति में बनी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी महान सरदार पटेल का प्रतीक बनकर शान से खड़ी है, जबकि वर्तमान समय में कांग्रेस की दयनीय स्थिति पूरे देश के सामने है.


दुष्यंत शुक्ला दिल्ली स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.