गोवा अग्निकांड और इंडिगो की चालाकी

पुरानी पीढ़ी के लोगों को सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमा हॉल याद होंगे. एक आयताकार हॉल होता था, जिसकी दोनों तरफ की दीवारों में बहुत सारे दरवाज़े होते थे, जिसके आगे दोनों ओर या तो बरामदे होते थे या खुला स्थान. उस समय सीनेमा हॉल के इस तरह बनाए जाने का कारण हमारी समझ में नहीं आता था.

सिनेमा हॉल भीड़ भरे स्थान होते है. जहां आग लगने की भी संभावना होती है. आग लगने के बाद वहां से भागना ही बचाव का एकमात्र तरीका होता है. इसीलिए भीड़ वाले सभी स्थानों पर भागने के रास्ते व वहां से निकलकर ऐसे स्थान जहां आग लगने की संभावना नहीं होती, बनाए जाते हैं.

भारत में घूसखोर सरकारी अमला देश के विकास और समस्याओं के समाधान के बीच सबसे बड़ा रोड़ बना हुआ है. उनका एक ही आदेश होता है: हमे रिश्वत दो और फिर चाहे जो करो. मालिक भी सोचते है कि जब रिश्वत देनी ही है तो नियम के पालन पर पैसा क्यों खर्च करना. परिणामत: गोवा के एक कल्ब में आग लगने से 25 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. भारत में रेस्टोरेंट खोलने के लिए 40 से अधिक लाइसेंस चाहिए होते हैं. यानी 40 इंस्पेक्टर्स ने इस क्लब को चेक किया और रिश्वत खायी और यह नहीं देखा कि आग लगने की स्थिति में भागने के लिए रास्ते व स्थान है या नहीं.

इंडिगो की कोई अगर फ्लाइट लेट होती थी तो एसएमएस व फ़ोन कॉल दोनों आते थे. लेकिन चार व पांच दिसंबर को न कोई एसएमएस आया न फ़ोन. इंडिगो चाहती थी कि एयरपोर्ट पर भीड़ हो, तमाशा हो ताकि पैनिक में सरकार को नियम वापस लेने पड़े. इंडिगो में इतनी हिम्मत कैसे आई कि विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था व चौथी सेना की मालिक सरकार से भिड़ गई? इसका जवाब है वही घूसखोरी. घूस देने वाले धीरे-धीरे मानने लगते हैं कि “लिफाफा पहुंचाओ और फिर कुछ भी करो.” घूस लेने वाले का ध्यान सिर्फ घूस लेने पर होता है, फिर पब्लिक को एयरपोर्ट पर बुलाकर परेशान करो, बस में जलाकर मार दो, रेस्टोरेंट में जलाकर मार दो. जो मन में आए करो.

प्रहार फिल्म में एक सीन है जिसमें नाना पाटेकर एक पुलिस कर्मी, जिसने गर्भवती महिला को सड़क पार नहीं करने दी थी, को कहता कि महिला का मृत बच्चा वास्तव में वह पुलिसकर्मी स्वयं ही है. यानी स्वयं उसका नंबर भी जल्द ही आएगा. सभी घूसखोर सरकारी कर्मचारी को ध्यान में रहना चाहिए कि एयरपोर्ट पर तड़पते लोग, रेस्टोरेंट की आग में तड़पते लोग, कल वे स्वयं ही होंगे.

यह तो बस समय की बात है.


अधिरथी स्वतंत्रता के रक्षक हैं.