इस साल मई में बड़े पर्दे पर आने वाली नीरज घेवान की नैरेटिव आधारित फिल्म होमबाउंड दो दोस्तों: मोहम्मद शोएब अली (ईशान खट्टर) और चंदन कुमार वाल्मीकि (विशाल जेहटवा) के बीच बातचीत से शुरू होती है. जिसमें शोएब कहता है, “हम भागते नहीं रह सकते, चंदन. जब तुम वर्दी पहन लेते हो, तो तुम्हारा धर्म और जाति कोई मायने नहीं रखती. एक बार हम पुलिस वाले बन गए, तो कोई हमें अपमानित करने की हिम्मत नहीं करेगा.”
इस बात को साबित करने के लिए तर्क देने के बजाय, फिल्म की शुरुआत में ही घेवान दिखाते हैं कि मुसलमानों और दलितों दोनों को उनके धर्म और जाति के कारण अपमानित किया जाता है और उन्हें ऐसा करने के लिए सुरक्षा यानी पुलिस की आवश्यकता होती है.
कश्मीरी पत्रकार बशारत पीर के 2020 के लेख टेकिंग अमृत होम, जिसका शीर्षक बाद में बदलकर ‘ए फ्रेंडशिप, ए पैंडेमिक एंड ए डेथ बिसाइड द हाइवे’ कर दिया गया, से प्रेरित होकर, घेवान अपनी फिल्म में शोएब और वाल्मीकि को सरकारी व्यवस्था के शिकार के रूप में चित्रित करते हैं. यह फ़िल्म दो दोस्तों, मोहम्मद सयूब और अमृत कुमार, की सच्ची कहानी पर आधारित है. दोनों सूरत में मज़दूरी करते थे. लेकिन उनमें से केवल एक ही घर लौट सका, क्योंकि दूसरा दोस्त घर पहुंचने से पहले ही बुखार से मर गया.
फिल्म में ऊंची जातियों को बदनाम किया गया है. एक दृश्य में, जाति से ब्राह्मण अर्जुन मिश्रा (योगेंद्र विक्रम सिंह) ऑफिस बॉय के रूप में काम करने वाले शोएब से पानी की बोतल न भरने के लिए कहता है; दूसरे दृश्य में, भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच देखने के बाद, मिश्रा उसे ताना मारते हुए कहता है, “अगर शोएब के हाथ में होता, तो वह मैदान में उतरकर पाकिस्तान के लिए आठ विकेट ले लेता.” इसके अलावा, वह शोएब द्वारा घर से लाए गए हलवे को, जो उसकी मां ने बनाया था, “वास्तव में लाहौरी” बताता हैं, जो एक मुस्लिम के प्रति उच्च जाति के मन में बैठे पूर्वाग्रह को उजागर करता है.
वाल्मीकि और उनकी मित्र सुधा भारती – जिनसे उनकी मुलाकात रेलवे प्लेटफार्म पर होती है और बाद में उनसे प्रेम हो जाता है – के बीच होने वाली बातचीत उनके उत्पीड़न की कहानियों को उजागर करती है. भारती कहती है, “लेकिन असल में क्या बदलेगा, चंदन? ये लोग वर्दी से नहीं डरते.” भारती के संवाद में “ये लोग” का मतलब “ऊंची जाति” के लोगों से है. 2022 की एक सरकारी रिपोर्ट में पाया गया कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत लगभग 15% मामले झूठे दावों या साक्ष्यों की कमी के कारण बंद कर दिए गए. जिनमें 14.78% एससी और 14.71% एसटी मामले थे. 60% से कुछ अधिक मामलों में आरोप पत्र दायर किए गए, जिनमें एससी के लिए 60.38% और एसटी के लिए 63.32% मामले शामिल हैं. 2022 में दोषसिद्धि दर घटकर 32.4% रह गई, जो 2020 में 39.2% थी.
फिल्म का उद्देश्य उत्पीड़न के विमर्श को आगे बढ़ाना प्रतीत होता है, जिसमें यह दर्शाया गया है कि ब्राह्मण न केवल निचली जातियों को दबाते हैं, बल्कि मुसलमानों को भी निशाना बनाते हैं. फिर भी, यह कहानी वास्तविक जीवन की घटनाओं से प्रेरित होने के बजाय कल्पना पर आधारित दिखाई पड़ती है.
धर्मा प्रोडक्शंस द्वारा निर्मित, होमबाउंड के लिए 2025 के कान फिल्म फेस्टिवल में लोगों ने नौ मिनट तक खड़े होकर तालियां बजाई थीं, जहां फिल्म को अन सर्टेन रिगार्ड श्रेणी में प्रदर्शित किया गया था. मैंने लगभग सभी बड़े मीडिया हाउस द्वारा दिखाई गई इसकी समीक्षा पढ़ी और देखी, लेकिन मुझे कहीं भी इसकी आलोचना करते हुए नहीं देखा, यह तो छोड़ ही दीजिए कि इसमें उच्च जातियों को किस प्रकार चित्रित किया गया है.
यह भारतीय मीडिया में उच्च जाति के पात्रों के प्रति उदासीनता को दर्शाता है, जो उच्च जाति के पात्रों के चित्रण की शायद ही कभी जांच या परवाह करता है या उसे चुनौती देता है. जिससे सालों से चली आ रही उनके प्रति कटूता और झूठ बिना किसी रोक के आगे बढ़ते रहते है. उच्च जाति के मुसलमान निचली जाति के मुसलमानों को अछूत मानते हैं. दक्षिण एशियाई इस्लाम में चार प्रकार की जातियां हैं: अशरफ (कुलीन), अज़लाफ (निम्न कुल में जन्मे) और अर्ज़ल (अशिष्ट). अशरफ पदानुक्रम में सबसे ऊपर हैं, उसके बाद अज़लाफ और अंत में अर्ज़ल आते हैं.
अक्टूबर 2014 और अप्रैल 2015 के बीच, जनसंख्या के हिसाब से भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के 14 जिलों में 7000 दलित मुस्लिम परिवारों पर एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया गया. बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि अध्ययन के अनुसार उनमें से कम से कम 1/3 को अपने मृतकों को “उच्च जाति के मुस्लिम” कब्रिस्तान में दफ़नाने की अनुमति नहीं है, उनमें से लगभग 13% ने बताया कि उन्हें “उच्च जाति के मुस्लिम” घरों में अलग बर्तनों में भोजन/पानी मिला और लगभग 8% “दलित मुसलमानों” ने बताया कि उनके बच्चों को कक्षाओं में और स्कूल के दोपहर के भोजन के दौरान अलग पंक्तियों में बैठाया जाता है.
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, घेवान एक दलित परिवार से आते हैं और फिल्म से वह भावात्मक रूप से जुड़े हैं. होमबाउंड में एक नव-बौद्ध विवाह दिखाया गया है, जहां लड़का, लड़की और बुद्ध पुजारी डॉ. बीआर अंबेडकर की तस्वीर के सामने मंत्रोच्चार करते हैं. ऐसा ही कुछ समय पहले उनकी सीरीज मेड इन हेवन के सीजन 2 में भी देखा गया था.
घेवान ने कहा है, “हिंदी सिनेमा के इतिहास में मैं अपने समुदाय का एकमात्र व्यक्ति हूं जो कैमरे के पीछे और सामने दोनों जगह नज़र आ चुका है.” लेकिन उन्होंने अपनी पहचान पर अधिक ज़ोर देते हुए व्यक्तिगत विश्वास को वास्तविक सच्चाई से ऊपर उठने दिया है और कला को प्रस्तुति के माध्यम के रूप में कम और दावे के रूप में अधिक प्रयोग किया है.
नव-बौद्ध विवाह की अवधारणा नव-बौद्ध धर्म से आई है, जिसे आंबेडकरवादी बौद्ध धर्म भी कहा जाता है. यह आंदोलन निर्वाण की एक क्रांतिकारी पुनर्व्याख्या पेश करता है और व्यक्तिगत ज्ञानोदय के बजाय सामाजिक शांति और न्याय के माध्यम से इसकी प्राप्ति पर ज़ोर देता है.
अक्टूबर 1935 में, आंबेडकर ने घोषणा की कि वह हिंदू धर्म त्याग देंगे; हालांकि, उन्होंने औपचारिक रूप से ऐसा 21 साल बाद, अक्टूबर 1956 में किया और धर्मांतरण समारोह के दौरान 22 प्रतिज्ञाएं लेकर बौद्ध धर्म अपनाया. आलोचकों का तर्क है कि ये प्रतिज्ञाएं हिंदू विरोधी हैं और हिंदू धर्म के प्रति शत्रुता को बढ़ावा देती हैं.
दलित फिल्म निर्माता ने लोकेशन के साथ चतुराई से काम किया है. पीर के लेख के अनुसार, सैय्यब के दो भाई काम की तलाश में मुंबई जाते हैं. लेकिन फिल्म में शोएब के पिता हुसैन अली (पंकज दुबे) चाहते हैं कि वह दुबई चले जाएं क्योंकि उनका मानना है कि भारत में हर दिन मुसलमानों का अपमान किया जा रहा है, जिससे फिल्म में मुसलमानों के प्रति व्यवस्थित शत्रुता और पीड़ित होने की कहानी को बल मिलता है.
होमबाउंड के डिस्क्लेमर में कहा गया है कि “फिल्म निर्माता संवैधानिक मूल्यों और धार्मिक सह-अस्तित्व की भारतीय परंपरा में विश्वास करता है.” लेकिन फिल्म देखने पर उनका यह दावा झूठा नज़र आता है.
इसमें “केंद्र और राज्य सरकारों, उनकी विभिन्न एजेंसियों और सभी कोविड योद्धाओं के योगदान को मान्यता देने” का भी दावा किया गया है, लेकिन यह केवल एक मिनट की छोटी सी पंक्ति में ही दिखाई देता है. कुल मिलाकर, यह फिल्म एकतरफा दृष्टिकोण देती है और उन प्रयासों को नजरअंदाज करती है जिनके लिए यह खड़ी होने का दावा करती है.
24 मार्च, 2020 को भारत में लगभग 600 मामले सामने आने के बाद, केंद्र सरकार ने कोविड-19 को रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की. पीर ने अपने लेख में इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक नाटक रचने वाला फैसला बताया.
हालांकि भारत में डब्ल्यूएचओ के प्रतिनिधि डॉ. हेंक बेकेडम ने महामारी से निपटने के लिए सरकार के फैललों की सराहना की और इन्हें “व्यापक और मजबूत” बताया.
इसके अलावा, घोषणा से एक दिन पहले, डब्ल्यूएचओ के आपातकालीन कार्यक्रम के निदेशक माइक रयान ने कहा, “इस महामारी का भविष्य इस बात से निर्धारित होगा कि घनी आबादी वाले देशों की स्थिति कैसा रहेगी.”
वास्तव में, एक स्थानीय राजनेता ने सैय्यब की मदद की, एम्बुलेंस की व्यवस्था की और उसके दोस्त कुमार को पहले एक छोटे अस्पताल में ले जाया गया और बाद में बेहतर सुविधाओं वाले अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां आईसीयू में उसकी मृत्यु हो गई. लेकिन फिल्म में यह सच्चाई छिपाते हुए वाल्मीकि को अपने दोस्त शोएब की गोद में, एक सुनसान राजमार्ग पर अकेले मरते हुए दिखाया गया है और कोई भी उसकी मदद के लिए नहीं आता.
होमबाउंड उन कई फिल्मों में से एक है जिनमें तथ्यों से छेड़छाड़ की गई है, फिर भी इसे पहचान और तारीफ़ मिली. नवंबर 2021 में रिलीज़ हुई जय भीम में फिल्म के खलनायकों में से एक सब-इंस्पेक्टर के किरदार को वन्नियार समुदाय से जुड़ा हुआ दिखाया गया था. वास्तव में, वह सब-इंस्पेक्टर एंथनी सामी था और वन्नियार समुदाय से नहीं था.
इसी तरह, शाहरुख़ खान की चक दे इंडिया में मीर रंजन नेगी के किरदार को बदलकर कबीर खान कर दिया गया, जिससे फिल्म इस्लामोफोबिया के इर्द-गिर्द घूमती रही.
घेवान का दृष्टिकोण लापरवाही और फिल्म निर्माण में सच को झूठ और प्रोपगेंडा में बदल देने की चालाकी की ओर ईशारा करता है. पहले भाग के एक अन्य दृश्य में, वाल्मीकि को एक उच्च जाति के सरकारी अधिकारी द्वारा उनकी जाति के बारे में पूछताछ करते हुए दिखाया गया है. इस दृश्य में, वाल्मीकि कहता है, “मैं एक कायस्थ हूं,” लेकिन उपशीर्षक की एक गलती के कारण इसे “मैं एक ब्राह्मण हूं” दिखाया गया है.
आगे, अधिकारी कहता है, “ये आरक्षण वाले सभी सीटें हड़प लेते हैं.” स्क्रीन पर, लेकिन उपशीर्षक में लिखा होता है, “ये ‘कोटा वाले चूहे’ सभी सीटें हड़प लेते हैं.” पहली तकनीकी फिल्म 1896 में बनी थी. पहली लंबी फीचर फिल्म 10 साल बाद, 1906 में, “द स्टोरी ऑफ़ द केली गैंग” रिलीज़ हुई. पहले, मूक फिल्मों के दृश्यों के बीच शीर्षक बताने वाले कार्ड का इस्तेमाल किया जाता था और कहानी बताने के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण थे.
उपशीर्षक और कैप्शनिंग में, सटीकता रखना नैतिक जिम्मेदारी होती है, क्योंकि यहां की गई गलतियां गलतफहमी पैदा करती हैं और यहां तक कि किसी दृश्य में कही बात के अर्थ को भी बदल सकती हैं.
लेकिन ऐसा लगता है कि घेवान सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए अपने प्रोपगेंड़ा को फैलाने में अधिक व्यस्त रहे हैं. पीर ने अपने लेख में बताया, जिसमें सैय्यूब ने पीर से कहा, “किसी ने मुझे परेशान नहीं किया. मैंने बस अपना काम किया जिसके लिए मुझे पैसे मिले.” इन पंक्तियों से एक सवाल उठता है कि जब कोई व्यक्ति खुद किसी भी तरह के भेदभाव से इनकार करता है, तो क्या तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करते खुद के पीड़ित होने का आख्यान गढ़ना सही है?
एस शिवा दिल्ली स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.

